१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र ३४ २२५ अणिमा आदि (अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये अष्ट सिद्धियाँ अथवा ऐश्वर्य हैं) आठ ऐश्वर्यों को प्राप्त करने का संकल्प भी बन्धन है॥ २१॥ देवमनुष्याद्युपासनाकामसंकल्पो बन्धः ॥ २२॥ मनोकामना की पूर्ति के संकल्पपूर्वक की गई देवताओं और मनुष्यों की उपासना भी बन्धन रूप है ॥ २२ ॥ यमाद्यष्टाङ्गयोगसंकल्पो बन्धः ॥ २३ ॥ यम आदि (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) आठ अङ्गों वाले योग का संकल्प भी बन्धन ही है॥ २३॥ वर्णाश्रमधर्मकर्मसंकल्पो बन्धः ॥ २४ ॥ वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) और आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) धर्म-कर्म के संकल्प भी बन्धन स्वरूप हैं ॥ २४ ॥ आज्ञाभयसंशयात्मगुणसंकल्पो बन्धः ॥ २५ ॥ आज्ञा, भय, संशय आदि आत्म-गुणों के संकल्प भी बन्धन हैं ॥ २५ ॥ यागव्रततपोदानविधिविधानज्ञानसंकल्पो बन्धः ॥ २६ ॥ यज्ञ, व्रत, तप और दान के विधि-विधान तथा ज्ञान के संकल्प भी बन्धन हैं ॥२६ ॥ केवलमोक्षापेक्षासंकल्पो बन्धः ॥ २७॥ मोक्ष प्राप्ति का विचार करना भी बन्धन रूप है ॥२७ ॥ संकल्पमात्रसंभवो बन्धः ॥ २८॥ संकल्प मात्र से जो कुछ सम्भव है, वह सभी बन्धन स्वरूप है ॥ २८ ॥ मोक्ष इति च नित्यानित्यवस्तुविचारादनित्यसंसारसुखदुःख विषयसमस्तक्षेत्र ममताबन्धक्षयो मोक्षः ॥ २९ ॥ जब नित्य और अनित्य वस्तुओं के विषय में विचार करने से नश्वर संसार के सुख-दुःखात्मक सभी विषयों से ममतारूपी बन्धन विनष्ट हो जाएँ, उस (स्थिति) को मोक्ष कहते हैं॥ २९ ॥ उपास्य इति च सर्वशरीरस्थचैतन्यब्रह्मप्रापको गुरुरुपास्यः ॥ ३० ॥ समस्त शरीरों में स्थित, चैतन्य स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त कराने वाला गुरु ही उपास्य (पास बैठने योग्य) है॥ शिष्य इति च विद्याध्वस्तप्रपञ्चावगाहितज्ञानावशिष्टं ब्रह्मैव शिष्यः ॥ ३१ ॥ जिसके हृदय में विद्या द्वारा नष्ट हुए जगत् के अवगाहन से उत्पन्न ब्रह्म रूप ज्ञान शेष रहे, वही शिष्य है॥ विद्वानिति च सर्वान्तरस्थस्वसंविद्रूपविद्विद्वान् ॥ ३२॥ सबके अन्तर में स्थित आत्म तत्त्व के विज्ञानमय स्वरूप को जानने वाला ही विद्वान् है ॥३२ ॥ मूढ इति च कर्तृत्वाद्यहंकारभावारूढो मूढः ॥ ३३ ॥ कर्त्तापन आदि के भाव में आरूढ़ व्यक्ति ही मूढ़ (मूर्ख) है ॥ ३३ ॥ आसुरमिति च ब्रह्मविष्ण्वीशानेन्द्रादीनामैश्वर्यकामनया निरशनजपाग्निहोत्रादि- ष्वन्तरात्मानं संतापयति चात्युग्ररागद्वेषविहिंसादम्भाद्यपेक्षितं तप आसुरम् ॥ ३४॥ जो ब्रह्मा, विष्णु, ईशान और इन्द्र आदि देवों के ऐश्वर्य की कामनापूर्वक व्रत, जप, यज्ञ आदि में अन्तरात्मा को तपाये तथा अत्युग्र राग-द्वेष, हिंसा, दम्भ आदि दुर्गुणों से युक्त होकर जो तप करे, वह आसुरी तप कहलाता है ॥ ३४ ॥