१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२८ प्रणवापानषद् सूर्यमण्डलमाभाति ह्यकारश्चन्द्रमध्यगः। उकारश्चन्द्रसंकाशस्तस्य मध्ये व्यवस्थितः॥ ७॥ सूर्य मण्डल का जो स्वरूप है, वह ॐकार के अक्षरों में 'अकार' का स्वरूप है। चन्द्रमण्डल का स्वरूप 'उकार' से निरूपित है, जो इस ॐकार के मध्य में अवस्थित है॥ ७॥ मकारश्चाग्निसंकाशो विधूमो विद्युतोपमः। तिस्रो मात्रास्तथा ज्ञेयाः सोमसूर्याग्नितेजसः॥ ८॥ ॐकार का अन्तिम अक्षर मकार, उस अग्नि स्वरूप में है, जो धूम्ररहित है, विद्युत् सदृश है। ॐकार की तीनों मात्राओं को चन्द्र, सूर्य और अग्नि के तेजस् के स्वरूप में समझना चाहिए॥ ८॥ शिखा च दीपसंकाशा यस्मिन्नु परिवर्तते। अर्धमात्रा तथा ज्ञेया प्रणवस्योपरि स्थिता॥ ९॥ दीपक की ज्योतिशिखा के स्वरूप में, जिसमें शिखा ऊर्ध्वगामी हो, उस प्रणव अक्षर 'ॐकार' के ऊपर स्थित अर्द्धचन्द्र-अर्द्ध मात्रा को समझना चाहिए॥ ९॥ पद्मसूत्रनिभा सूक्ष्मा शिखाभा दृश्यते परा। नासादि सूर्यसंकाशा सूर्य हित्वा तथापरम्॥ १०॥ दूसरी कमल सूत्र (कमल नाल) के सदृश सूक्ष्म शिखा की कान्ति (मस्तक प्रदेश में) दृष्टिगोचर होती है, वह नासारन्ध्र से सूर्यवत् तेज को धारण कर सूर्यमण्डल का भेदन कर वहाँ स्थित है॥ १०॥ द्विसप्ततिसहस्त्राणि नाडिभिस्त्वा तु मूर्धनि। वरदं सर्वभूतानां सर्वं व्याप्यैव तिष्ठति॥ ११॥ अग्नि स्वरूप में वह शिखा (ॐकार की अर्द्धमात्रा) बहत्तर हजार नाड़ियों के द्वारा सम्पूर्ण प्राणियों को वर (जीवन-प्राण) देने वाली और सबको व्याप्त करके अवस्थित है॥ ११॥ कांस्यघण्टानिनादः स्याद्यदा लिप्यति शान्तये। ओङ्कारस्तु तथा योज्यः श्रुतये सर्वमिच्छति॥ १२॥ जब मुमुक्षु मोक्ष प्राप्ति के निकट शान्त स्थिति को प्राप्त होता है, तो काँसे के घण्टे के समान निनाद सुनाई देता है, यह ॐ कार का ही स्वरूप है। इस स्वरूप को सभी साधक सुनने की इच्छा करते हैं॥ १२॥ यस्मिन् स लीयते शब्दस्तत्परं ब्रह्म गीयते। सोऽमृतत्वाय कल्पते सोऽमृतत्वाय कल्पते इति॥ १३॥ जो साधक (उक्त) ओङ्कार स्वरूप शब्द नाद में लीन हो जाता है, वह ब्रह्मस्वरूप ही कहा जाता है। वही अमृतत्व को प्राप्त हो जाता है, यह सुनिश्चित है॥ १३॥ ॥ इति प्रणवोपनिषत् समाप्ता ॥