१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न २ मन्त्र १३ २३३ प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण! प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥७॥ ˙हे प्राण! आप ही प्रजापति हैं, गर्भ में आप ही निवास करते हैं और आप ही माता-पिता के समान आकृति वाले होकर जन्म लेते हैं। हे प्राण! यह प्रजा आपको ही बलि प्रदान करती है, क्योंकि आप ही सम्पूर्ण इन्द्रियों सहित प्रतिष्ठित हैं॥७॥ देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा। ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥८॥ (हे प्राण!) आप ही देवताओं के लिए अग्नि हैं। पितृगणों के लिए स्वधा हैं। यह सत्य (तथ्य) अथर्वा और आङ्गिरस ऋषियों द्वारा प्रमाणित किया गया है॥८॥ इन्द्रस्त्वं प्राण! तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता। त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥९॥ हे प्राण! आप ही इन्द्र हैं। अपने तेज के फलस्वरूप रुद्र हैं और सब ओर से हमारी सुरक्षा करने वाले हैं। आप ही ज्योतियों के स्वामी सूर्य हैं। आप ही अन्तरिक्ष में विचरण करते हैं॥९॥ यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः। आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥१०॥ हे प्राण! जब आप मेघरूप होकर वर्षण करते हैं, तब यह समस्त प्रजा प्रभूत अन्न उत्पादन की आशा से आह्लादित हो जाती है॥१०॥ व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः। वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥ ११॥ हे प्राण! आप व्रात्य (संस्कार विहीन) होकर भी एकर्षि नामक अग्नि हैं। हम आपके निमित्त जो आहार प्रदान करते हैं, आप उसके भोक्ता हैं। आप इस जगत् के स्वामी हैं। हे प्राण! आप हमारे पिता हैं तथा आप ही वायु रूप होकर आकाश में विचरण करने वाले मातरिश्वा हैं॥ ११॥ या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि। या च मनसि संतता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥१२॥ आपका जो स्वरूप वाणी, श्रोत्र, नेत्र और मन में संव्याप्त है, आप उसे शान्त करें (कल्याणमय करें)। आप शरीर से बहिर्गमन करने की चेष्टा न करें॥ १२॥ प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्। मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३॥ इस जगत् अथवा तृतीय द्युलोक (त्रिदिव-स्वर्ग) में जो भी प्रतिष्ठित है, वह सब प्राण के ही वश में है। हे प्राण! आप हमारी उसी प्रकार रक्षा करें, जिस प्रकार माता पुत्र की सुरक्षा करती है। आप हमें श्री (समृद्धि) और प्रज्ञा प्रदान करें॥ १३॥ [ भूलोक को 'प्रथम', भुवः (अन्तरिक्ष) लोक को द्वितीय तथा स्वः (स्वर्ग या त्रिदिव) लोक को 'तृतीय' की संज्ञा प्रदान की जाती है।]