भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

२३६ प्रश्नोपनिषद् तस्मै स होवाच। यथा गार्ग्य। मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति। ताः पुनःपुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न श्रृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥ महर्षि पिप्पलाद ने गार्ग्य ऋषि से कहा- हे गार्ग्य ! जिस प्रकार सूर्य की रश्मियाँ उसके अस्त होने पर सिमटकर उसी के तेजोमंडल में एकीभूत हो जाती है और सूर्योदय होने पर पुनः सर्वत्र फैल जाती है, उसी प्रकार समस्त इन्द्रियाँ परमदेव मन में एकीभूत हो जाती हैं, तब यह पुरुष न देखता है, न सुनता है, न स्वाद लेता है, न सूँघता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न मल का त्याग करता है, न आनंद का अनुभव करता है और न ही किसी प्रकार की चेष्टा करता है, तब उसकी इस स्थिति को शयन करना (सो जाना) कहते हैं॥ २॥ प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति गार्हपत्यो ह वा एषोऽ पानो व्यानोऽ न्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात्प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥ (सोते समय) इस शरीररूप पुर (नगर) में प्राणरूप अग्नि ही जाग्रत् रहता है। यह अपान ही गार्हपत्य अग्नि है। व्यान ही अन्वाहार्यपचन नामक अग्नि है। गार्हपत्य से ले जाया गया प्राण ही 'प्रणयन प्रक्रिया' के कारण आहवनीय अग्निरूप है॥ ३॥ [ ऋषि यहाँ काया में सतत चलने वाली जीवन रूपी यज्ञीय प्रक्रिया का स्वरूप व्यक्त कर रहे हैं।] यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः। मनो ह वाव यजमान इष्टफलमेवोदानः स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४॥ शरीरधारी में उच्छ्वास और निःश्वास (श्वास लेना और छोड़ना) ही यज्ञाहुतियाँ हैं। उन आहुतियों को समानता पूर्वक विभक्त करने के कारण समान वायु (ही ऋत्विक्) है। मन निश्चित ही यजमान है और अभीष्ट फल उदान है। यही उदान (इच्छित फल) मन को नित्य ही ब्रह्म में स्थित करता है॥ ४॥ अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनु- श्रृणोति देशादिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्य सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥ स्वप्न की स्थिति में यह देव अपनी महिमा का अनुभव करता है। जाग्रत् अवस्था में इसने जो देखा था, उसी को पुनः (स्वप्न में) देखता है, जो सुना था उसे ही सुनता है, विभिन्न दिशाओं में अनुभव किये हुए को पुनः-पुनः अनुभव करता है। (इतना ही नहीं) यह देखे-अनदेखे, सुने-अनसुने, अनुभूत-अननुभूत, सत् और असत् समस्त पदार्थों को देखता है और स्वयं भी सर्वरूप बनकर देखता है॥ ५॥ स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्छरीरे एतत्सुखं भवति ॥ जब यह जीवात्मा तेजस् से सम्पन्न होता है, तब यह स्वप्न नहीं देखता। उस समय शरीर में यह आनन्द (सुषुप्ति सुख) अनुभव करता है॥ ६॥ स यथा सोम्य ! वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ हे सोम्य ! जिस प्रकार पक्षी अपने निवास स्थान वृक्ष पर जाकर बैठ जाते हैं, उसी प्रकार ये समस्त तत्त्व परम आत्मा में प्रतिष्ठित हो जाते हैं ॥ ७ ॥