१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 24, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ [भूमिका]
एवं अस्त की प्रक्रिया में विभिन्न दिशाओं का उल्लेख किया गया है, अधिकांश आचार्यों ने उन दिशाओं को पृथ्वी की दिशाएँ मानकर अर्थ करने के प्रयास किये हैं, जो विवेक को सन्तुष्ट नहीं कर पाते। ये दिशाएँ पृथ्वी की दिशाएँ नहीं हैं। जैसा कि इसी अध्याय के खण्ड २ से ५ में स्पष्ट लिखा है कि विशिष्ट दिव्य प्रवाहों की स्थापना सूर्य के विशिष्ट (पूर्वादि नामक) भागों में हुई है। यहाँ सूर्य के उन्हीं भागों से विशिष्ट अमृत प्रवाहों के प्रकट होने की बात कही गयी है। आदित्य के पूर्व से उदय का भाव यह लिया जाना चाहिए कि जब आदित्य का पूर्ववाला भाग दृश्य होता है उस समय तक वसुगणों का तथा उनसे सम्बद्ध अमृत का प्रवाह वातावरण एवं साधक पर रहता है। आगे के खण्डों में भी इसी प्रकार सूर्य के अन्य दक्षिण, पश्चिम आदि भागों के उदय-अस्त (दृश्यादृश्य) का भाव लिया जाना उचित है। इसी प्रकार ऐतरेय १.१.२ में पृथ्वी के नीचे पुनः आपः (अधस्तात् ता आपः) का भाव भी अधिकांश भाष्यों में खुल नहीं सका है। यहाँ आपः को सामान्य जल मानने से बात नहीं बनती। इस संदर्भ में ऐत० १.१.२ तथा १.१.४ की टिप्पणियों द्वारा अवधारणा को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि आपः प्रकृति का मूल क्रियाशील प्रवाह है, अवलोकन करें- यहाँ लोकों के नाम और उनकी स्थितियाँ विचारणीय हैं। पृथ्वी को 'मर' - मृत्युलोक कहा जाता है। अन्तरिक्ष-मरीचि अर्थात् प्रकाश किरणों वाला लोक माना जाता है। मरीचि का अर्थ शब्द कल्पद्रुम के अनुसार पापों, क्षुद्र जीवों या तमस् को मारने वाला कहा गया है। अन्तरिक्ष में ऐसे तेजस्वी मारक प्रवाह होने की पुष्टि वर्तमान विज्ञान भी करता है। अम्भ=अम् (प्राण) तथा भः ( भरणकर्त्ता) से बना है। द्युलोक से परे यह अव्यक्त रूप से सूक्ष्म प्राण का भरण करने वाला लोक है, जिसकी प्रत्यक्ष प्रतिष्ठा के रूप में द्युलोक है। पृथ्वी के नीचे आपः लोक का भाव अनेक आचार्यों ने माना है, जो समीचीन नहीं लगता। वेद के सन्दर्भ से यह भाव स्पष्ट होता है। ऋग्वेद ने आपः को सृष्टि के मूल क्रियाशील प्रवाह के रूप में व्यक्त किया है। आपः सृष्टि का आधारभूत द्रव्य है; इसलिए ऋषि ने उसे 'या अधस्तात् ता आपः' जो आधार रूप है, वह आपः है, ऐसा कहा है। वही हिरण्यगर्भ रूप है, जिसे वेद ने स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां (पृथ्वी और द्युलोक का आधार वही है) कहा है। आपः जल को भी कहते हैं; किन्तु वह अर्थ लेने से मन्त्र का भाव सिद्ध नहीं होता है। अस्तु, आपः को वेद की अवधारणा के आधार पर ही स्वीकार करना उचित है। इसे 'ताः' स्त्रीलिंग बहुवचन का सम्बोधन दिया गया है। इसी आपः तत्त्व के गर्भ में ब्रह्म का संकल्प बीज रूप में पककर विश्वरूप बनता है। यह गुण मातृसत्ता का होने से आपः को 'देवी आपः' या 'ता आपः' कहना उचित है। इस उपनिषद् में भी अगले मंत्रों में आपः का उत्पादक प्रयोग बार-बार परिलक्षित होता है। यहाँ वीर्य से पुनः 'आपः' की उत्पत्ति कही गयी है। यह बड़ा वैज्ञानिक-मार्मिक कथन है। आपः सृष्टिकर्त्ता आधारभूत प्रवाह है। वीर्य में ही पुनः सृष्टि करने में समर्थ बीज तैयार होता है, वीर्य उस सूक्ष्म आपः प्रवाह के चक्र को पुनः प्रयुक्त करने में सक्षम है, ऐसा ऋषि का अनुभव है। उसी आपः तत्त्व में चेतना पुनः रूप ग्रहण करने लगती है। ऋषियों ने सृष्टि के विकास के क्रम में प्रयुक्त हर विधा का उल्लेख एक आवश्यक श्रेष्ठ प्रक्रिया के रूप में किया है। अमैथुनी और मैथुनी सृष्टि दोनों के रहस्यों और उनसे सम्बंधित मर्यादाओं का वर्णन है। ऐतरेय ५.८.२ में उन्होंने प्रजनन प्रक्रिया को नारी रूपी अग्नि में सम्पन्न यज्ञ के रूप में किया है।