१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें२७२ बृहदारण्यकोपनिषद् ॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥ मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्य उद्यास्यन्वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्यान्तं करवाणीति ॥ १ ॥ महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपनी धर्मपत्नी मैत्रेयी से कहा- हे मैत्रेयी ! मैं अब वर्तमान स्थान (गृहस्थाश्रम) से ऊपर (वानप्रस्थ आश्रम में) जाना चाहता हूँ। अतः मेरी आकांक्षा है कि दूसरी धर्मपत्नी कात्यायनी और आपके बीच (सम्पत्ति का) विच्छेद (बँटवारा) कर दूँ ॥ १ ॥ सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्कथं तेनामृता स्यामिति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितः स्यादमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेनेति ॥ २ ॥ (यह सुनकर) मैत्रेयी बोली- हे भगवन् ! धन्य-धान्य से पूरित इस सम्पूर्ण धरती की यदि मैं स्वामिनी बन जाऊँ, तो क्या मैं अमर पद पा सकूँगी ? महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा नहीं, जैसे साधन-सम्पन्नों का जीवन होता है, वैसा ही तुम्हारा जीवन हो जायेगा। धन से अमृतत्व की आशा नहीं करनी चाहिए ॥२॥ सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां ? यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥ मैत्रेयी बोली- हे स्वामी ! जिस धन-ऐश्वर्य से मैं अमृतत्व प्राप्त नहीं कर सकती, उसे ग्रहण करके मैं क्या करूँगी ? हे भगवन् ! यदि आप कोई अमृतत्व प्राप्त करने के उपाय जानते हों, तो वह मुझे बताने का अनुग्रह करें ॥ स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्स्व व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥ याज्ञवल्क्य ने कहा-हे मैत्रेयी ! तुम हमारी प्रिया हो और प्रिय लगने योग्य वचन भी बोल रही हो। तुम आकर बैठो-मैं तुम्हारे लिए अमृतत्व प्राप्त कराने वाला उपदेश प्रदान करता हूँ। तुम मेरे आदेश का निदिध्यासन (अनुपालन) करना ॥ ४ ॥ स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ॥ ५ ॥