भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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२८ अमृतनादोपनिषद् उस (प्रणवरूपी) रथ के द्वारा तब तक चलना चाहिए, जब तक कि रथ द्वारा चलने योग्य मार्ग पूर्ण न हो जाये। जब वह मार्ग (लक्ष्य) पूर्ण हो जाता है, तब उस रथ को छोड़ कर मनुष्य स्वतः ही प्रस्थान कर जाता है॥ ३॥ [जब ध्वनि तरंगें रेडियो तरंगों के साथ अपने लक्ष्य-ट्रांजिस्टर तक पहुँच जाती हैं, तो वे उन्हें छोड़कर अपने वास्तविक रूप में पुनः प्रकट हो जाती हैं। इसी प्रकार प्राण को चाहिए कि वह अपने इष्ट लक्ष्य तक पहुँच कर वाहक-रथ (कैरियर) को छोड़कर अपने को इष्ट के साथ संयुक्त कर दे, यह परामर्श ऋषि दे रहे हैं।] मात्रालिङ्गपदं त्यक्त्वा शब्दव्यञ्जनवर्जितम्। अस्वरेण मकारेण पदं सूक्ष्मं हि गच्छति॥ ४॥ प्रणव की अकारादि जो मात्राएँ हैं तथा उन (मात्राओं) में जो लिङ्गभूत पद हैं, उन सभी के आश्रयभूत संसार का चिन्तन करते हुए उसका त्याग कर, स्वरहीन 'मकार' वाची ईश्वर का ध्यान करने से साधक की क्रमशः उस सूक्ष्म पद में प्रविष्टि हो जाती है। यह परम तत्त्व ('अकार' आदि स्वरों तथा 'ककारादि' व्यंजनों रूपी) सभी प्रपंचों से पूर्णतया दूर है॥ ४॥ शब्दादि विषयान्पञ्च मनश्चैवातिचञ्चलम्। चिन्तयेदात्मनो रश्मीन्प्रत्याहारः स उच्यते॥ ५॥ शब्द, स्पर्श आदि पाँचों विषय तथा इनको ग्रहण करने वाली समस्त इन्द्रियाँ एवं अति चंचल मन- इनको सूर्य के सदृश अपनी आत्मा की रश्मियों के रूप में देखें अर्थात् आत्मा के प्रकाश से ही मन की सत्ता है और उसी प्रकार स्वरूप आत्मा की बाह्य सत्ता से शब्द आदि विषय भी सत्तावान् हैं। इस प्रकार से आत्म-चिन्तन को ही प्रत्याहार कहते हैं॥ ५॥ प्रत्याहारस्तथा ध्यानं प्राणायामोऽथ धारणा। तर्कश्चैव समाधिश्च षडङ्गो योग उच्यते ॥ ६॥ प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क तथा समाधि इन छः अंगों से युक्त साधना को योग कहा गया है॥ ६॥ यथा पर्वतधातूनां दह्यन्ते धमनान्मलाः। तथेन्द्रियकृता दोषा दह्यन्ते प्राणधारणात् ॥ ७॥ जिस प्रकार पर्वतों में उत्पन्न स्वर्ण आदि धातुओं का मैल अग्नि में तपाने से भस्म हो जाता है। उसी प्रकार समस्त इन्द्रियों के द्वारा किये गये दोष प्राणों को रोकने अर्थात् प्राणायाम की प्रक्रिया द्वारा भस्म हो जाते हैं॥ ७॥ [प्राण शक्ति का भोगों की ओर भटकना ही पापों को जन्म देता है, उसके नियमन से पाप की संभावना समाप्त होने लगती है।] प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषम्। प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥ ८॥ किल्बिषं हि क्षयं नीत्वा रुचिरं चैव चिन्तयेत् ॥ ९॥ प्राणायाम के माध्यम से दोषों (अर्थात् इन्द्रियों में एकत्रित विकारों) को तथा धारणा के माध्यम से पापों को (अर्थात् कुसंस्कारों को) जलाकर भस्म कर डालें। प्रत्याहार के द्वारा इन्द्रिय के संसर्ग से उत्पन्न