भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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अध्याय ३ ब्राह्मण २ मन्त्र १ २८३ याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्याध्वर्युुरस्मिन्यज्ञ आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या हुता उज्ज्वलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अधिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥ अश्वल ने प्रश्न किया-हे याज्ञवल्क्य ! इस यज्ञ में आज अध्वर्यु कितनी आहुतियाँ प्रदान करेगा ? उन्होंने कहा- 'तीन' । फिर उसने पूछा कि तीन कौन-कौन सी ? तब याज्ञवल्क्य ने कहा कि पहली वह जो होमे जाने पर प्रज्वलित होती है, दूसरी वह जो तीव्र शब्द करती है और तीसरी आहुति वह, जो होमे जाने पर पृथ्वी में विलीन हो जाती है। अश्वल ने पुनः प्रश्न किया कि इन आहुतियों के द्वारा यजमान किस प्रकार विजय प्राप्त करता है ? ऋषि ने बताया-प्रथम आहुति से यजमान देवलोक को जीत लेता है,द्वितीय के द्वारा पितृलोक को और तृतीय के द्वारा मनुष्य लोक को जीत लेता है,क्योंकि मनुष्य लोक निम्नवर्ती है ॥ ८ ॥ याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वेदेवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ९ ॥ अश्वल ने पूछा- यज्ञ के ब्रह्मा आज इस यज्ञ में दक्षिण दिशा की ओर से कितने देवताओं के द्वारा यज्ञ का संरक्षण करेंगे ? ऋषि ने उत्तर दिया केवल एक देवता के द्वारा। अश्वल ने कहा- किस देवता के द्वारा ? ऋषि ने कहा- वह देवता मन है। मन अनन्त है और विश्वेदेवा भी अनन्त हैं। उस मन रूपी देवता के द्वारा यजमान अनन्त लोकों पर विजय प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥ याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्योद्गातास्मिन्यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्याऽपानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकँ शस्यया ततो ह होताश्वल उपरराम ॥ अश्वल ने पूछा-हे याज्ञवल्क्य ! आज उद्गाता इस यज्ञ में कितने स्तोत्रों का गायन करेगा ? याज्ञवल्क्य ने कहा-तीन स्तोत्रों का। तब अश्वल ने पूछा- वे तीन स्तोत्र कौन से हैं ? ऋषि ने कहा-पुरोनुवाक्या, याज्या और शस्या नामक वे तीन स्तोत्र हैं। अश्वल ने पूछा-इनमें शरीर में रहने वाले कौन से हैं ? ऋषि ने कहा- प्राण ही पुरोनुवाक्या है, अपान ही याज्या है और व्यान ही शस्या है। अश्वल के यह पूछने पर कि इन स्तोत्रों द्वारा किस पर विजय प्राप्त की जा सकती है, ऋषि बोले-पुरोनुवाक्या से पृथिवी लोक पर, याज्या द्वारा अन्तरिक्ष लोक पर और शस्या द्वारा द्युलोक पर विजय प्राप्त की जा सकती है। यह सुन कर अश्वल चुप हो गये ॥१०॥ ॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥ अथ हैनँ जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये ते तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥ १ ॥