भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र २७ ३०१ अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै यद्ध्येतदन्यत्रास्म-त्स्याच्छ्वानो वैनदद्युर्वयांसि वैनद्विमथीरन्निति ॥ २५ ॥ याज्ञवल्क्य ने कहा- अरे अहल्लिक (प्रेत) ! जब तुम इस (हृदय) को हमसे पृथक् मानते हो, तब तो (हृदय विहीन) इस शरीर को कुत्ते नोच कर खा जाते या पक्षीगण चोंच मार-मार कर इसे मथकर (चीरकर) खा डालते ॥ २५ ॥ कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इत्यपान इति कस्मिन्वपानः प्रतिष्ठित इति व्यान इति कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इत्युदान इति कस्मिन्नूदानः प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्येतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषाः स यस्तानुरुषान्निरुह्य प्रत्युह्यात्यक्रामत्तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति तं ह न मेने शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यपजहुरन्यन्मन्यमानाः ॥ २६ ॥ शाकल्य ने फिर पूछा- आप (शरीर) और हृदय (आत्मा) किसमें प्रतिष्ठित हैं ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- प्राण में। शाकल्य ने फिर पूछा- प्राण किसमें स्थित हैं ? उत्तर दिया अपान में । पूछा गया- अपान किसमें विद्यमान है ? उत्तर दिया गया-व्यान में। फिर प्रश्न किया गया-व्यान किसमें स्थित है ? उत्तर दिया गया-उदान में। उदान किसमें प्रतिष्ठित है ? समान में। याज्ञवल्क्य ने आगे कहा-यह आत्मा नेति-नेति कहा जाता है। यह ग्रहण नहीं किया जा सकता और न ही विनष्ट किया जा सकता है। यह सङ्ग रहित अव्यवस्थित और अहिंसित है। ये आठ शरीर हैं, आठ देवता हैं और आठ पुरुष हैं। वह व्यष्टि रूप होकर इन पुरुषों को अपने हृदय में एकीकृत करके उपाधिरूप धर्मों का अतिक्रमण किए है। उपनिषद् द्वारा ज्ञातव्य उस पुरुष के विषय में मैं आपसे पूछता हूँ। यदि आप उसका स्पष्ट विवेचन न कर सकेंगे, तो आपका मस्तक गिर जायेगा; परन्तु शाकल्य के उस पुरुष को न जानने के कारण उसका मस्तक गिर गया। इतना ही नहीं उसकी अस्थियों को चोर लोग कुछ और समझकर उठा ले गये ॥ २६ ॥ अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो वः कामयते तं वः पृच्छामि सर्वान्वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः ॥ २७॥ याज्ञवल्क्य बोले - हे तपोधन पूज्य ब्राह्मणगण ! आप विद्वानों में से जो भी चाहे अथवा सभी मिलकर चाहें तो मुझसे प्रश्न कर लें। यदि आप प्रश्न न करना चाहें, तो आप में से जिसकी इच्छा हो, उससे अथवा सभी से मैं प्रश्न पूछूँ; किन्तु किसी का भी याज्ञवल्क्य से प्रश्न करने का साहस न हुआ ॥ २७ ॥ तान् हतैः श्लोकैः पप्रच्छ । यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा। तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः ॥ १ ॥ त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यन्दि त्वच उत्पटः । तस्मात्तदा तृण्णात्प्रैति रसो वृक्षादिवाहतात् ॥ २॥ मांसांन्यस्य शकराणि किनाटः स्नाव तत्स्थिरम् । अस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ ३ ॥ यद्वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः । मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात्प्ररोहति ॥४॥ रेतस इति मा वोचतजीवतस्तत्प्रजायते। धानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य संभवः ॥ ५॥