भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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मंत्र ३९ ३३

इस बाह्य प्राण में एक लाख तेरह सहस्र छः सौ अस्सी निःश्वासों (श्वास-प्रश्वास) का आवागमन एक दिन एवं रात्रि में होता है॥ ३४॥ [ प्रायः दिन-रात्रि में श्वासों की संख्या इक्कीस हजार छः सौ मानी जाती है। जो प्रति मिनट पन्द्रह निःश्वास के हिसाब से ठीक बैठती है, यहाँ इतनी संख्या का उल्लेख शोध का विषय है।] प्राण आद्यो हृदि स्थाने अपानस्तु पुनर्गुदे। समानो नाभिदेशे तु उदानः कण्ठमाश्रितः ॥ ३५ ॥ आदि प्राण का निवास हृदय क्षेत्र में, अपान का निवास गुदा स्थान में, समान का नाभि प्रदेश में एवं उदान का निवास कण्ठ प्रदेश में है॥ ३५॥ व्यानः सर्वेषु चाङ्गेषु व्याप्य तिष्ठति सर्वदा। अथ वर्णांस्तु पञ्चानां प्राणादीनामनुक्रमात् ॥ ३६ ॥ व्यान समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गों में व्यापक होकर सदैव प्रतिष्ठित रहता है। अब इसके पश्चात् समस्त प्राण आदि पाँचों वायुओं के रंग का क्रमानुसार वर्णन किया जाता है॥ ३६॥ रक्तवर्णो मणिप्रख्यः प्राणवायुः प्रकीर्तितः । अपानस्तस्य मध्ये तु इन्द्रगोपसमप्रभः ॥ ३७ ॥ इस प्राण वायु को लाल रंग की मणि के सदृश लोहित वर्ण की संज्ञा प्रदान की गई है। अपान वायु को गुदा के बीचो-बीच इन्द्रगोप-बीर बहूटी नामक गहरे लाल (रंग वाले एक बरसाती कीड़े के) रंग का माना गया है॥ ३७॥ समानस्तु द्वयोर्मध्ये गोक्षीरधवलप्रभः । आपाण्डुर उदानश्च व्यानो ह्यर्चिःसमप्रभः ॥ ३८ ॥ नाभि के मध्य क्षेत्र में समान वायु स्थिर है। यह गो-दुग्ध या स्फटिक मणि की भाँति शुभ्र कान्तियुक्त है। उदान वायु का रंग धूसर अर्थात् मटमैला है और व्यान वायु का रंग अग्निशिखा की भाँति तेजस्वी है॥ ३८॥ यस्येदं मण्डलं भित्त्वा मारुतो याति मूर्धनि । यत्र कुत्र म्रियेद्वापि न स भूयोऽभिजायते न स भूयोऽभिजायत इत्युपनिषत् ॥ ३९ ॥ जिस श्रेष्ठ योगी अथवा साधक का प्राण इस मण्डल (पञ्चतत्त्वात्मक शरीर-क्षेत्र, वायु स्थान एवं हृदय प्रदेश) का बेधन कर मस्तिष्क के क्षेत्र में प्रविष्ट कर जाता है, वह अपने शरीर का जहाँ कहीं भी परित्याग करे, पुनः जन्म नहीं लेता अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है, यही उपनिषद् (रहस्य) है॥ ३९॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु..... इति शान्तिः ॥ ॥ इति अमृतनादोपनिषत्समाप्ता ॥