१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ब्राह्मण ६ मन्त्र १ ३३१ तद्यत्तत्सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्पुरुष- स्तावेतावन्योन्यस्मिन्प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन्प्रतिष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन्भवति शुद्धमेवैतन्मण्डलं पश्यति नैनमेते रश्मयः प्रत्यायन्ति ॥ २ ॥ वह सत्य ही आदित्य रूप है। इस सूर्य मण्डल में विद्यमान पुरुष और दक्षिण नेत्र में स्थित पुरुष दोनों आपस में संयुक्त हैं। वे ये दोनों पुरुष एक दूसरे में स्थित हैं। आदित्य-रश्मियों के माध्यम से चाक्षुष पुरुष में स्थित है और चाक्षुष पुरुष आदित्य में प्राण के रूप में स्थित है। जब चाक्षुष पुरुष निकलने लगता है, उस समय यह आदित्य मण्डल को ही देखता है। पुनश्च, ये किरणें लौटकर समीप नहीं आती हैं ॥ २ ॥ य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकंः शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहरिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ३ ॥ इस आदित्य मण्डल में जो यह (सत्य नाम से युक्त) पुरुष विद्यमान है, 'भूः' उसका शिर है। (उस पुरुष का) शिर एक है तथा वह अक्षर भी एक ही है। 'भुवः' यह भुजा है, इसकी भुजाएँ दो हैं तथा ये अक्षर भी दोनों भुजाओं के रूप में (दो) हैं। 'स्वः' यह प्रतिष्ठा अर्थात् चरणों के रूप में हैं; चरण दो हैं और ये (स्वः=सुवः) अक्षर भी दो हैं। 'अहर्' (हन् धातु से बना है, अर्थ है- हननकर्ता) यह इस (पुरुष) का उपनिषद् (गूढ़ नाम) है, जो इस तरह से जानता हुआ, उस ब्रह्म की उपासना करता है, वह पापों का हनन करके उनका परित्याग कर देता है ॥ ३ ॥ योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकंः शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ४ ॥ यह दक्षिण नेत्र में जो पुरुष (विद्यमान) है। भूः उसका शिर है। (उस पुरुष का) शिर एक है तथा वह अक्षर भी एक ही है। 'भुवः' यह भुजा है, इसकी भुजाएँ दो हैं तथा ये अक्षर भी दोनों भुजाओं के रूप में (दो) हैं। 'स्वः' यह प्रतिष्ठा अर्थात् चरणों के रूप में हैं और ('स्वः = सुवः') अक्षर भी दो हैं। 'अहम्' (इसका भी अर्थ हननकर्ता है) उस (पुरुष) का उपनिषद् (गूढ़ नाम) है; जो इस तरह से जानता हुआ ब्रह्म की उपासना करता है, वह पापों का हनन करके उनका परित्याग कर देता है ॥ ४ ॥ ॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥ मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किंच ॥ १॥ यह पुरुष मनोमय एवं सत्य स्वरूप प्रकाश से युक्त है। यह हृदय के अन्तः भाग में व्रीहि (धान) अथवा यव (जौ) के रूप (जैसे सूक्ष्म आकार) में प्रतिष्ठित है। (यह अनन्त हृदय में योगियों द्वारा दृष्टिगोचर होता है।) वह इन सभी का स्वामी एवं अधिष्ठाता है और जो भी कुछ (दृश्य जगत्) है, सभी को अपने शासन में रखता है ॥ १॥