१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 333, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ब्राह्मण १३ मन्त्र १ ३३३ ॥ एकादशं ब्राह्मणम् ॥ एतद्वै परमं तपो यद्व्याहितस्तप्यते परमंः हैव लोकं जयति य एवं वेदौतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यंः हरन्ति परमंः हैव लोकं जयति य एवं वेदौतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परमंः हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥ रोगग्रस्त व्यक्ति को जो ताप-क्लेश होता है- यह निश्चित रूप से परम तप है, जो इस प्रकार श्रेष्ठ चिन्तन करता है, वह परम सत्य लोक को अपने वश में कर लेता है। मृत अवस्था को प्राप्त व्यक्ति को जो लोग जंगल (श्मशान) की ओर ले जाते हैं, यह भी श्रेष्ठ तप है, जो इस प्रकार से जानता है- वह भी परम सत्य लोक को जीत लेता है। मृत व्यक्ति को जो भी अग्नि में प्रतिष्ठित करते हैं, निश्चित ही यह परम तप है, जो इस तरह से जान लेता है, वह श्रेष्ठ लोक को अपने वश में कर लेता है॥ १ ॥ ॥ द्वादशं ब्राह्मणम् ॥ अन्नं ब्रह्मेत्येकआहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात्प्राणो ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह त्वेव देवते एकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः पितरं किंःस्विदेवैवं विदुषे साधु कुर्यां किमेवास्मा असाधु कुर्यामिति स ह स्माह पाणिना मा प्रातृद कस्त्वेनयोरेकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै वि अन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाणि ह वा अस्मिन्भूतानि विशन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥ १ ॥ प्रातृद ऋषि अपने पिता से विचार विमर्श करते हुए कहते हैं- कुछ लोगों का कथन है कि अन्न ब्रह्म है, किन्तु यह बात मिथ्या लगती है; क्योंकि प्राण के अभाव में अन्न सड़ (नष्ट हो) जाता है। कुछ लोग प्राण को ही ब्रह्म कहते हैं, किन्तु यह बात भी मिथ्या प्रतीत होती है, क्योंकि अन्न के अभाव में प्राण शुष्क पड़ जाता है। यह दोनों देव तत्त्व एक साथ मिलकर परमात्म भाव को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार की विशेष अनुभूति प्राप्त करने वाले का मैं क्या शुभ अथवा क्या अशुभ करूँ ? (क्योंकि कृतार्थ होने के उपरान्त उसका न तो शुभ किया जा सकता है और न तो अशुभ ।) तत्पश्चात् उसके पिता ने रोकते हुए इस प्रकार कहा-'हे प्रातृद' ! ऐसा मत कहो, इन दोनों तत्त्वों की समरूपता को प्राप्त करके कौन परमभाव को प्राप्त होता है? अतः उस (प्रातृद के पिता) ने 'वी' इस प्रकार कहा। 'वी' यही अन्न रूप है। 'वी' रूप अन्न में ही ये समस्त भूत (प्राणी) समाहित हैं। 'रम्' यह प्राण है, क्योंकि रं अर्थात् प्राण में ही ये समस्त भूत (प्राणी समुदाय) रमण करते हैं। जो इस प्रकार से जानता है (वह वीर है), उसमें ये सभी प्राणी समाहित होते हैं तथा सभी प्राणी रमण करते हैं॥ १ ॥ ॥ त्रयोदशं ब्राह्मणम् ॥ उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदंः सर्वमुत्थापयत्युद्धास्मादुक्थविद्वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य सायुज्यंः सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ १ ॥ प्राण ही 'उक्थ' अर्थात् स्तोत्र है, इस कारण 'उक्थ' की प्राण के रूप में उपासना करें; क्योंकि प्राण