भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 505 में से

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पृष्ठ 337

अध्याय ५ ब्राह्मण १५ मन्त्र १ ३३७ निर्गुण हैं; क्योंकि आपको किन्हीं साधनों से नहीं जाना जा सकता है। सभी लोकों के ऊपर स्थित आपके दर्शनीय तुरीय पद को नमन है। यह (संसारगत) पापरूपी शत्रु अपने कार्य में सफलता न प्राप्त करे। इस तरह से विद्वान् व्यक्ति जिससे द्वेष करता हो, 'उसकी कामना पूरी न हो' इस प्रकार उपस्थान करे अथवा 'मैं' इस वस्तु विशेष को प्राप्त करूँ, इस कामना से उपस्थान करे ॥ ७॥ एतद्ध वै तज्जनको वैदेहो बुडिलमाश्वतराश्विमुवाच यन्नु हो तद्गायत्रीविद्ब्रूथा अथ कथं हस्तीभूतो वहसीति मुखं ह्यस्याः सम्राण्न विदांचकारेति होवाच तस्या अग्निरेव मुखं यदिह वा अपि बह्निवाग्नावभ्यादधति सर्वमेव तत्संदहत्येवं हैवैवंविद्यद्यपि बह्निव पापं कुरुते सर्वमेव तत्संप्साय शुद्धःपूतोऽजरोऽमृतः संभवति ॥ ८॥ विदेहराज जनक ने (अश्वतराश्व के पुत्र) बुडिल आश्वतराश्वि से यह कहा था कि तुमने अपने आपको गायत्री महाविद्या का ज्ञाता कहा था, फिर हाथी बनकर भार क्यों वहन करते हो? ऐसा सुनकर उसने कहा- हे सम्राट्! मैं इस (गायत्री महाशक्ति) का मुख नहीं जानता था। (तदनन्तर जनक ने कहा-) इस (गायत्री महाशक्ति) का मुख 'अग्नि' है। जिस प्रकार अग्नि में जो भी (ईंधन) डाला जाता है, वह सब भस्म हो जाता है, ठीक उसी प्रकार गायत्री विद्या के निष्णात व्यक्ति को विविध कर्म करने पड़े हों, तब भी सभी पापों को जलाकर (शुद्ध कर्म भावना से) शुद्ध, पवित्र, जरा रहित-अजर और अमर हो जाता है ॥ ॥ पञ्चदशं ब्राह्मणम् ॥ हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये । पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि । वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् । ॐ ३ क्रतो स्मर कृतंस्मर क्रतो स्मर कृत ँ स्मर। अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ १॥ सत्यरूपी ब्रह्म का मुख ज्योतिर्मय स्वर्णपात्र से आच्छादित है। हे विश्व के पोषक सूर्यदेव ! सत्य धर्म के दर्शन के लिए मैं उसे देख सकूँ, इसलिए आप उस (पर से) आवरण को हटा दें। हे पूषन् (पोषणकर्ता) ! हे एकर्षे (सर्वद्रष्टा) ! हे यम ! हे सूर्य ! हे प्राजापत्य ! आप अपनी रश्मियों को समेटकर तेज को कम कर लें, जिससे आपका जो अतिकल्याणकारी रूप है, उस रूप को मैं देख सकूँ। यह जो आदित्यमण्डल में स्थित पुरुष है, वह अमृतस्वरूप मैं ही हूँ। प्राणवायु इस बाहर की वायु को तथा यह शरीर भस्मावशेष होकर पृथ्वी को प्राप्त करे। यह अमृत (आत्मा) आपको समर्पित है। हे प्रणवरूप विश्वकर्ता ! स्मरण करें (मेरा ध्यान रखें)। मैंने जो भी कर्म किया है, उसका स्मरण करें। हे क्रतुरूप (जीवात्मा)! जो भी स्मरण करने योग्य है, उसी का स्मरण करें। किये हुए कृत्य का स्मरण करें। हे अग्निदेव ! आप हमें कर्मफल की प्राप्ति हेतु सुन्दर पथ (देवयान मार्ग) से ले चलें। हे देव ! आप हमारे सभी कर्मों को जानने वाले हैं। हमारे कुटिल पापों को दूर करें (नष्ट करें)। हम आपको बार-बार नमन करते हैं॥ १॥

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