१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४४ बृहदारण्यकोपनिषद् पुरुषो वाऽग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित्प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः संभवति ॥ १२ ॥ हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसका खुला हुआ मुँह ही समिधाएँ हैं। प्राण ही धुआँ है, वाणी ही ज्वाला है, चक्षु ही अङ्गारे हैं और श्रोत्र ही विस्फुलिङ्ग (चिनगारी) हैं। इस (श्रेष्ठ दिव्य) अग्नि में ही समस्त देवता अन्न का होम करते हैं। उस (अन्न) की आहुति से ही रेतस् (वीर्य) प्रकट होता है॥ १२॥ योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः संभवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १३ ॥ हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ (उत्पादक अंग) ही समिधा है, लोम समूह ही धुआँ है, योनि ही ज्वाला है, सहवास ही अङ्गारे और आनन्द ही चिनगारी है। इस अग्नि में सभी देव समूह रेतस् (वीर्य) की आहुति करते हैं। उस यजन कृत्य से पुरुष की उत्पत्ति होती है। वह जीवन धारण किये रहता है, जब तक कर्म शेष रहते हैं, तब तक ही जीवित रहता है और जब मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ १३॥ अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित्समिद्धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरङ्गारा अङ्गारा विस्फुलिङ्गा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णः संभवति ॥ १४॥ तब इसे अग्नि के समक्ष ले जाते हैं। उस (आहुतिभूत पुरुष) का अग्नि ही अग्निरूप होता है, समिधाएँ ही समिधा रूप होती हैं। धूम्र ही धुआँ रूप होता है, ज्वाला ही ज्वाला होती है, अङ्गार ही अङ्गारे होते हैं और चिनगारियाँ ही विस्फुलिङ्ग होते हैं। इस अग्नि में देवता लोग पुरुष की ही आहुति देते हैं। उस आहुति द्वारा ही मनुष्य तेजोमय रूप वाला होता है ॥ १४ ॥ ते य एवमेतद्विदुर्यै चामी अरण्ये श्रद्धाꣳ सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह आपूर्यमाणपक्षमपूर्यमाणपक्षाद्यान्षण्मासानुदङ्ङादित्य एति मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्याद्वैद्युतं तान्वैद्युतान्पुरुषो मानस एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ १५ ॥ इस प्रकार जो (गृहस्थ और वानप्रस्थी) इस (पञ्चाग्नि विज्ञान) को जानते हैं और अरण्य (वन) में श्रद्धासिक्त हृदय से सत्य (ब्रह्म) की उपासना करते हैं, वे आर्चिषी अवस्था अथवा ज्योति के अभिमानी देव को प्राप्त करते हैं, इससे (आर्चिषी से) वे आह्निक को अर्थात् दिन के अभिमानी देवता को प्राप्त करते हैं, आह्निक से शुक्लपक्ष को, शुक्लपक्ष से उत्तरायण वाले छः महीनों को, षण्मासों से देवलोक को, देवलोक से आदित्य को, आदित्य से वैद्युत (विद्युत् सम्बन्धी देवता) को, वैद्युत से एक मानस पुरुष इन्हें ब्रह्मलोक में ले जाता है। वे उस ब्रह्मलोक में दीर्घकाल तक निवास करते हैं। उनका पुनरावर्तन (अर्थात् पुनर्जन्म) नहीं होता ॥ १५ ॥