१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४६ बृहदारण्यकोपनिषद् तुममें प्रतिष्ठित जितने तिर्यग् (कुटिल) देवगण हैं, उन सभी देवों को मैं आहुति प्रदान करता हूँ। वे सभी तृप्त होकर मेरी कामनाओं को पूर्ण करें। इन देवताओं के अतिरिक्त जो तिरश्ची (कुटिल) देवियाँ हैं, उनको भी मैं घृताहुति प्रदान करता हूँ। वे भी मेरी कामनाओं को पूर्ण करें॥ १ ॥ ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति चक्षुषे स्वाहा संपदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति श्रोत्राय स्वाहाऽयतनाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ २ ॥ (साधक या याजक) 'ज्येष्ठाय स्वाहा', 'श्रेष्ठाय स्वाहा' इन मन्त्रों से यज्ञ में आहुति प्रदान करता हुआ स्रुवा के अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है, 'प्राणाय स्वाहा', 'वसिष्ठायै स्वाहा' इन मन्त्रों से आहुति प्रदान करता हुआ संस्रव (स्रुवा में बचे घृत) को मन्थ में डाल देता है, 'वाचे स्वाहा', 'प्रतिष्ठायै स्वाहा' इन मन्त्रों से अग्नि में हवन करते हुए संस्रव को मन्थ में डाल देता है, 'चक्षुषे स्वाहा', 'सम्पदे स्वाहा' मन्त्र बोलते हुए आहुति करके अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है, 'श्रोत्राय स्वाहा', 'आयतनाय स्वाहा' उच्चारण करते हुए आहुति प्रदान करके बचे हुए घृत को मन्थ में डाल देता है, 'मनसे स्वाहा', 'प्रजात्यै स्वाहा' मन्त्रों से आहुति करके संस्रव को मन्थ में डाल देता है, 'रेतसे स्वाहा' मन्त्र के साथ आहुति देकर अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है ॥ २ ॥ अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ ३ ॥ 'अग्नये स्वाहा' मन्त्र से अग्नि में आहुति प्रदान करता हुआ अवशिष्ट घृत को मन्थ में डाल देता है। सोमाय स्वाहा, भूः स्वाहा, भुवः स्वाहा, स्वः स्वाहा, भूर्भुवः स्वः स्वाहा, ब्रह्मणे स्वाहा, क्षत्राय स्वाहा, भूताय स्वाहा, भविष्यते स्वाहा, विश्वाय स्वाहा, सर्वाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा इत्यादि मन्त्रों का उच्चारण करते हुए संस्रव (अवशिष्ट घृत) को मन्थ में डाल देता है ॥ ३ ॥ अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकसभमसि हिंकृतमसि हिंक्रियमाणमस्युद्गीथमस्युद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्दे संदीप्तमसि विभूरसि प्रभूरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥