१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६० मन्त्रिकोपनिषद् कोई उसे चौबीस संख्यक तत्त्वों वाला (सांख्य दर्शन), कोई उसे व्यक्त (जगत्) और कोई अव्यक्त (प्रकृति) मानते हैं। कोई उसे द्वैत (जीव-ब्रह्म) और कोई अद्वैत (ब्रह्म) मानते हैं। इसी प्रकार कोई उसे तीन रूपों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) वाला और कोई पाँच रूपों वाला (ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी और गणेश) मानते हैं॥ १५ ॥ ब्रह्माद्यं स्थावरान्तं च पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः । तमेकमेव पश्यन्ति परिशुभ्रं विभुं द्विजाः ॥ १६ ॥ अनेक ज्ञान-दृष्टि सम्पन्न विद्वान् ब्रह्म (सबसे बड़ा तथा चैतन्य रूप) से लेकर जड़-पदार्थों तक में एक ही अतिशुभ्र (शुद्ध) व्यापक सर्वोच्च सत्ता को व्याप्त हुआ अनुभव करते हैं॥ १६ ॥ यस्मिन्सर्वमिदं प्रोतं ब्रह्म स्थावरजंगमम् । तस्मिन्नेव लयं यान्ति स्रवन्त्यः सागरे यथा ॥ १७॥ यह सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत् उस ब्रह्म में ही समाया हुआ है। जिस प्रकार नदियाँ बहती हुई समुद्र में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् भी उस ब्रह्म में ही लय को प्राप्त होता है॥ १७॥ यस्मिन्भावाः प्रलीयन्ते लीनाश्चाव्यक्ततां ययुः । पश्यन्ति व्यक्ततां भूयो जायन्ते बुद्बुदा इव ॥ १८ ॥ जिस प्रकार पानी का बुल-बुला पानी से उत्पन्न होता है और पानी में ही लय हो जाता है; उसी प्रकार जिसमें सम्पूर्ण जीव-पदार्थ जन्म लेते हैं तथा जिसमें लय होकर अदृश्य हो जाते हैं, उसी को ज्ञानीजन ब्रह्म कहते हैं॥ १८॥ क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं चैव कारणैर्विद्यते पुनः । एवं स भगवान्देवं पश्यन्त्यन्ये पुनःपुनः ॥ १९ ॥ वह 'क्षेत्रज्ञ' रूप में सम्पूर्ण प्राणियों में अधिष्ठित होता है और वह कार्य के पीछे (समस्त) कारणों को जानने वाला होता है। ऐसे उस परम पुरुष को विद्वान् साधक बार-बार देखते हैं ॥ १९ ॥ ब्रह्म ब्रह्मेत्यथायान्ति ये विदुर्ब्राह्मणास्तथा। अत्रैव ते लयं यान्ति लीनाश्चाव्यक्तशालिनः ॥ लीनाश्चाव्यक्तशालिन इत्युपनिषत् ॥ २० ॥ जो विद्वान् (ब्रह्मवेत्ता) उस ब्रह्म को जानते हैं, वे उसी ब्रह्म में लीन हो जाते हैं, उसी में लय होकर वे अव्यक्त रूप से सुशोभित होते हैं, यह सुनिश्चित है। यही उपनिषद् (रहस्य) है॥ २० ॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॥ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं........ इति शान्तिः ॥ ॥ इति मन्त्रिकोपनिषत्समाप्ता ॥