भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 368

३६८ मुण्डकोपनिषद् दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥ २ ॥ वह प्रकाशमान, अमूर्तरूप ब्रह्म अन्दर-बाहर सर्वत्र विद्यमान है। वह अजन्मा, प्राणरहित, मनरहित एवं उज्ज्वल है और अविनाशी आत्मा से भी उत्कृष्ट है ॥ २ ॥ एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥ इसी अविनाशी ब्रह्म से प्राण, मन एवं समस्त इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। इसी से आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं विश्व को धारण करने वाली पृथिवी उत्पन्न होती है ॥ ३ ॥ अग्निमूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥ अग्नि जिस (ब्रह्म) का मस्तक है, सूर्य और चन्द्र जिसके नेत्र हैं, दिशाएँ अथवा सुविस्तृत वेदवाणियाँ जिसके कर्ण हैं, वायु जिसका प्राण है, सम्पूर्ण विश्व जिसका हृदय है, पृथिवी जिसके पैरों की उत्पत्ति है, निश्चय ही वह ब्रह्म सम्पूर्ण प्राणियों में अन्तरात्मा रूप में प्रतिष्ठित है ॥ ४ ॥ तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात्पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् । पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात्संप्रसूताः ॥ ५ ॥ उस विराट् पुरुष से ही वह अग्नि उत्पन्न हुआ है, सूर्य जिसकी समिधा रूप है। (उस आकाशस्थ अग्नि से निष्पन्न) सोम से पर्जन्य और पर्जन्य से पृथिवी में ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। ओषधियों से पुरुष में वीर्य उत्पन्न होता है, पुरुष द्वारा उस वीर्य के सिंचन से पुरुष से ही समस्त प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं ॥ ५ ॥ तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च । संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥ उसी विराट् पुरुष से ऋचाएँ, साममन्त्र, यजुः, दीक्षा, सम्पूर्ण यज्ञ, समस्त कर्म तथा दक्षिणाएँ प्रकट हुईं। संवत्सर, यजमान, सब लोक (मनुष्यादि) उसी से उत्पन्न हुए। उसी के द्वारा वे लोक भी उत्पन्न हुए, जहाँ चन्द्रमा पवित्रकारक रश्मियाँ बिखेरता तथा सूर्य ऊर्जा पहुँचाता है ॥ ६ ॥ तस्माच्च देवा बहुधा संप्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि । प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥ ७ ॥ उस विराट् पुरुष से ही विविध देवता, साध्यगण (देव विशेष), मनुष्यगण, पशु, पक्षी, प्राण-अपान, धान, जौ, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधि (यम-नियमादि) सब उत्पन्न हुए हैं ॥ ७ ॥ सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ ८ ॥ उस पुरुष से ही सात प्राण (दो नेत्र, दो श्रवण, दो घ्राण, एक जिह्वा) उत्पन्न हुए। उसी से अग्नि की सात ज्वालाएँ, सात समिधाएँ (सात विषय), सात यज्ञ उत्पन्न हुए। उसी से ये सात लोक प्रकट हुए, जिनमें सात प्राण विचरते हैं। प्रत्येक प्राणीरूप गुहा में आश्रित-सन्निहित ये सात-सात पदार्थ उसी से प्रकट होते हैं ॥ ८ ॥