१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुण्डक ३ खण्ड १ मन्त्र ७ ३७१ ॥ तृतीयं मुण्डकम् ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १ ॥ साथ-साथ रहने तथा सख्यभाव वाले दो पक्षी एक ही वृक्ष पर रहते हैं। उनमें से एक उस वृक्ष के पिप्पल (कर्मफल) का स्वाद लेता है और दूसरा अनशन (निराहार) पूर्वक केवल देखता रहता है ॥ १ ॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽ नीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ २ ॥ समान वृक्ष (देह) पर निवास करने वाला जीवात्मा मोह में डूबा हुआ असमर्थ होकर शोक-संतप्त रहता है। जब वह योगियों से सेवित परमात्मा की महिमा का बोध प्राप्त करता है, तब मुक्त हो जाता है ॥ २ ॥ यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३ ॥ जब वह जीव द्रष्टारूप, प्रकाशमान, परमपुरुष, विश्व के उत्पत्तिकर्त्ता, ब्रह्मा के रचयिता को देखता है, तब वह विद्वान् पाप-पुण्य को त्याग कर निर्मल और श्रेष्ठ साम्यरूप को प्राप्त हो जाता है ॥ ३ ॥ प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन्विद्वान्भवते नातिवादी । आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥ यह ब्रह्म ही सब प्राणियों के अन्दर प्राण रूप में प्रकाशित हो रहा है, जो विद्वान् इसे जानता है, वह अहंकारोक्ति नहीं करता। वह आत्मा में क्रीड़ा करने वाला और आत्मा में रमण करने वाला पुरुष जगत् में कर्म करते हुए ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठता को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ ५ ॥ आत्मारूप उस ब्रह्म की प्राप्ति सत्यभाषण, तपश्चर्या, सम्यग्ज्ञान, ब्रह्मचर्य आदि निश्चित व्रतों से होती है। वह शुभ्र (उज्ज्वल) ज्योतिष्मान् ब्रह्म शरीर के अन्दर अधिष्ठित रहता है, उसे वही योगी देख पाते हैं जो स्वयं को दोषों से मुक्त कर लेते हैं ॥ ५ ॥ सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥ सत्य की ही विजय होती है, झूठ की नहीं। सत्य से ही देवयान मार्ग परिपूर्ण है। इसके द्वारा कामनारहित ऋषिगण उस पद को प्राप्त होते हैं, जहाँ सत्य के श्रेष्ठ भण्डाररूप परमात्मा का निवास है ॥ ६ ॥ बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत्सूक्ष्मतरं विभाति । दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥ वह ब्रह्म (परमात्मा) अत्यन्त महान् और दिव्य है। वह सहज चिंतन की सीमा से भी परे है। वह