१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमुण्डक ३ खण्ड २ मन्त्र ८ ३७३ नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥ ३ ॥ यह आत्मा न तो प्रवचन से प्राप्त होता है, न मेधा (विशिष्ट बुद्धि) से अथवा बहुत श्रवण करने से ही प्राप्त होता है। जो पुरुष केवल उस आत्मा की प्राप्ति की इच्छा करता है, उसी (इच्छा) से वह प्राप्त होता है। उसी साधक के लिए यह आत्मा अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है ॥ ३ ॥ [ लौकिक ज्ञान प्राप्त करने की विधियों से आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता । लौकिक ज्ञान पदार्थ की तरह हैं , जिन्हें पुरुषार्थ पूर्वक हस्तगत किया जा सकता है। आत्मज्ञान चेतना युक्त है, वह साधक की पात्रता देखकर स्वयं ही अपने स्वरूप को उद्घाटित करता है। ] नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् । एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥ यह आत्मा न तो बलहीन पुरुष को प्राप्त होता है,न प्रमादयुक्त व्यक्ति को और न ही तत्त्वरहित (ज्ञान रहित) तपश्चर्या से वह प्राप्त होता है। जो ज्ञानी पुरुष इन उपायों से (ज्ञानयुक्त तप से) यत्न करता है, उसे यह आत्मा ब्रह्मधाम में प्रविष्ट करा देता है ॥ ४ ॥ संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः । ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५ ॥ कामना से रहित विशुद्ध अन्तःकरण वाले ऋषिगण ज्ञान से तृप्त होकर परम शान्त रहते हुए उस परमात्मा को प्राप्त कर लेते हैं। वे विवेकी पुरुष उस सर्वव्यापी, सर्वरूप परमेश्वर को सर्वत्र प्राप्त कर उसमें समाहित होकर उसी में ही प्रवेश कर जाते हैं ॥ ५ ॥ वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥ जिन्होंने वेदान्तविषयक विशिष्ट ज्ञान के द्वारा परमात्मा को निश्चयपूर्वक जान लिया है और जो वैराग्य तथा योग के द्वारा शुद्ध अन्तःकरण को प्राप्त हो चुके हैं, ऐसे साधक शरीर छोड़कर ब्रह्मलोक में प्रविष्ट होते हैं। वे सब ओर से मुक्त होकर श्रेष्ठ अमरत्व को प्राप्त करते हैं ॥ ६ ॥ गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ७ ॥ पन्द्रह कलाएँ और इन्द्रियाँ अपने-अपने अभिमानी देवताओं में प्रतिष्ठित हो जाती हैं। सम्पूर्ण कर्म और ज्ञान से परिपूर्ण जीवात्मा श्रेष्ठ, अविनाशी परब्रह्म में एकीभूत हो जाता है ॥ ७ ॥ [ प्रश्नोपनिषद् ६.४ में पन्द्रह कलाएँ-आकाश आदि पञ्चभूत, अन्न,वीर्य,इन्द्रिय,मन, श्रद्धा,तप,मन्त्र,कर्म लोक एवं नाम वर्णित हैं। यदि स्वयं उस ब्रह्म में समर्पित होना हो,तो पहले अपनी कलाओं-विभूतियों का अभिमान त्याग करे, उन्हें प्रभु को समर्पित कर दे; तभी स्वयं जीवात्मा को परमात्मा में समर्पित करना सम्भव होता है। ] यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ८ ॥