१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 375, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ मुद्गलोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् ऋग्वेद से सम्बद्ध है। इस उपनिषद् में ४ खण्ड हैं। प्रथम खण्ड में यजुर्वेदोक्त पुरुष सूक्त के १६ मन्त्रों के भावों-रहस्यों को खोलने के लिए संकेत किए गये हैं। दूसरे खण्ड में भगवान् द्वारा शरणागत इन्द्र को दिए गये उपदेशान्तर्गत पुरुष सूक्त के दो (अव्यक्त पुरुष और व्यक्त पुरुष) से सम्बन्धित खण्डों का वर्णन है। इसी में उसके अनिरुद्ध (प्रकट) पुरुष द्वारा ब्रह्माजी को अपनी काया को हव्य मानकर व्यक्त पुरुष रूप अग्नि में हवन करने का निर्देश एवं फल कहा गया है। तीसरे खण्ड में विभिन्न योनियों के साधकों द्वारा विभिन्न रूपों में उस पुरुष की उपासना किए जाने तथा उस पुरुष को जानने का फल वर्णित है। चौथे खण्ड में उक्त पुरुष की विलक्षणता तथा उसके प्रकट होने के विभिन्न घटकों का वर्णन करते हुए साधना द्वारा पुरुष रूप ही हो जाने का कथन है। अंत में इस गुह्य ज्ञान को प्रकट करने के अनुशासन को स्पष्ट किया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ वाङ्मे मनसि..........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य -ऐतरेयोपनिषद्) ॐ पुरुषसूक्तार्थनिर्णयं व्याख्यास्यामः। पुरुषसंहितायां पुरुषसूक्तार्थः संग्रहेण प्रोच्यते। 'पुरुष सूक्त' द्वारा मान्य अर्थ-निर्णय की व्याख्या करता हूँ- (इसका विवेचन करते हुए भगवान् वासुदेव ने देवराज इन्द्र से कहा था।) पुरुष संहिता में इस सूक्त का अर्थ संक्षिप्त रूप से कहा जा रहा है- सहस्त्रशीर्षेत्यत्र सशब्दोऽनन्तवाचकः। अनन्तयोजनं प्राह दशाङ्गुलवचस्तथा ॥ १ ॥ 'पुरुष सूक्त' में प्रयुक्त 'सहस्र' शब्द अनन्त का बोध कराता है। इसी प्रकार यह 'दशाङ्गुलम्' पद भी अनन्त योजनों (दूरी) को सूचना प्रदान करता है॥ १॥ [यहाँ प्रयुक्त 'सशब्दो' के स्थान पर 'सहस्रो' पाठ भी उपलब्ध होता है, जो अधिक समीचीन है।] तस्य प्रथमया विष्णोर्देशतो व्याप्तिरीरिता। द्वित्तीयया चास्य विष्णोः कालतो व्याप्तिरुच्यते ॥ २ ॥ 'पुरुष सूक्त' के इस प्रथम मन्त्र 'सहस्रशीर्षा०' में भगवान् विष्णु की सर्वव्यापी विभुता का विशद वर्णन किया गया है। पुरुष सूक्त का द्वितीय मन्त्र (पुरुषऽएवेदं०) इन्हीं लोकनायक विष्णु की शाश्वत व्याप्ति का संकेत करता है। वे सर्व-कालव्यापी हैं। हर समय विद्यमान रहते हैं॥ २॥ विष्णोर्मोक्षप्रदत्वं च कथितं तु तृतीयया। एतावानिति मन्त्रेण वैभवं कथितं हरेः ॥ ३॥ 'पुरुषसूक्त' का तृतीय मन्त्र उन विराट् पुरुष भगवान् विष्णु को मोक्ष प्रदान करने वाला बतलाता है। 'एतावानस्य०' इस तृतीय मन्त्र में भगवान् श्री हरि के वैभव का -उनकी सामर्थ्य का विस्तार से वर्णन किया गया है॥ ३॥ एतेनैव च मन्त्रेण चतुर्व्यूहो विभाषितः। त्रिपादित्यनया प्रोक्तमनिरुद्धस्य वैभवम् ॥ ४॥