१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ मन्त्र १२ ३८१ गुरुरप्येवंविच्छुचौ देशे पुण्यनक्षत्रे प्राणानायाम्य पुरुषं ध्यायन्नुपसन्नाय शिष्याय दक्षिणकर्णे पुरुषसूक्तार्थमुपदिशेद्विद्वान्। न बहुशो वदेत्। यातयामो भवति। असकृत्कर्णमुपदिशेत्। एतत्कुर्वाणोऽध्येताध्यापकश्च इह जन्मनि पुरुषो भवतीत्युपनिषत्॥ १२॥ इस पुरुष सूक्त के अर्थ के इस प्रकार भली-भाँति से जानने वाला वेदविद् गुरु भी शुद्ध पवित्र देश में, पुण्य (शुभ) नक्षत्र में, प्राणायाम करके, परम पुरुष का चिन्तन करता हुआ अति विनम्रता से समीप में आये हुए शिष्य को ही उसके दाहिने श्रोत्र में उपदेश दे। अधिक वार्ता न करे, नहीं तो वह श्रेष्ठ ज्ञान (उपदेश) यातयामत्व (निःसारता) रूप दोष से दूषित हो जाता है। इस प्रकार इस सूक्त के अर्थ का बहुशः उपदेश करे। ऐसे शिष्य (अध्येता) और गुरु (ज्ञानदाता) दोनों इसी जन्म में पूर्ण पुरुष (ब्रह्ममय) हो जाते हैं॥ १२॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ वाङ्मे मनसि......... इति शान्तिः। ॥ इति मुद्गलोपनिषत्समाप्ता ॥