भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 39

मन्त्र ९ ३९ वितत्य बाणं तरुणार्कवर्णं व्योमान्तरे भासि हिरण्यगर्भः । भासा त्वया व्योम्नि कृतः सुतार्थ्यस्त्वं वै कुमारस्त्वमरिष्टनेमिः ॥ ४॥ हे परमात्मन् ! आप ही मध्याह्नकालीन सूर्य के तेज की भाँति बाण को अपनी ओर आकृष्ट करके, माया द्वारा रचित इन समस्त प्राणियों के हृदयरूप आकाश में प्रकाशमान हिरण्यगर्भ रूप हैं। आपके ही दिव्य प्रकाश से भगवान् भास्कर आकाश में प्रकाशित होते हैं। आप ही देवताओं के सेनापति 'कार्तिकेय' के रूप में प्रतिष्ठित हैं और गरुड़ की तरह सभी अरिष्टों (विघ्नों) का भली- भाँति नियमन करने वाले हैं ॥ ४॥ त्वं वज्रभृद्भूतपतिस्त्वमेव कामः प्रजानां निहितोऽसि सोमे। स्वाहा स्वधा यच्च वषट् करोति रुद्रः पशूनां गुहया निमग्नः ॥ ५॥ (हे परमात्मन् !) आप ही वज्र को धारण करने वाले इन्द्र के रूप में तथा (भवरोग नाशक) रुद्र रूप में समस्त प्रजाओं के स्वामी हैं। आप ही अभीष्ट फलदायी पितरों के रूप में चन्द्रलोक में स्थित हैं तथा देवों एवं पितरों की तृप्ति हेतु सम्पन्न होने वाले यज्ञ और श्राद्ध अर्थात् स्वाहा, स्वधा एवं वषट्कार रूप हैं। आप ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हैं ॥ ५ ॥ धाता विधाता पवनः सुपर्णो विष्णुर्वराहो रजनी रहश्च । भूतं भविष्यत्प्रभवः क्रियाश्च कालः क्रमस्त्वं परमाक्षरं च ॥ ६ ॥ (हे भगवन् !) आप ही (प्राण रूप में) धाता (धारण करने वाले) तथा (सृष्टि-संरचना के रूप में) विधाता, पवन, गरुड़, विष्णु, वाराह, रात एवं दिन हैं। आप ही भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान भी हैं। सभी क्रियाएँ, कालगति और परमाक्षर (अर्थात् परम अविनाशी तत्त्व ॐकार) रूप में आप ही विद्यमान हैं ॥ ६ ॥ ऋचो यजूंषि प्रसवन्ति वक्त्रात्सामानि सम्राड्वसुरन्तरिक्षम् । त्वं यज्ञनेता हुतभुग्विभुश्च रुद्रास्तथा दैत्यगणा वसुश्च ॥ ७॥ जिसके मुख से ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद आदि उत्पन्न (प्रकट) होते हैं, वे आप ही हैं। आप ही सम्राट् (राजा अथवा सर्वत्र प्रकाशित) वसु, अन्तरिक्ष, यज्ञीय प्रक्रिया सम्पन्न करने वाले, यज्ञीय भाग ग्रहण करने वाले एवं सर्वशक्तिमान् हैं। आप ही एकादश रुद्र, (दिति की सन्तान) दैत्यरूप एवं सर्वत्र व्याप्त होने वाले (वसुरूप) हैं॥ ७॥ स एष देवोऽम्बरगश्च चक्रे अन्येऽभ्यधिष्ठेत तमो निरुन्ध्यः । हिरण्मयं यस्य विभाति सर्वं व्योमान्तरे रश्मिमिमंसुनाभिः ॥ ८ ॥ (हे परमात्मन्!) विभिन्न रूपों वाले आप ही सूर्य मण्डल में विद्यमान तथा अन्यत्र (अन्य स्थान एवं जीव के हृदय में स्थित) अज्ञानान्धकार को विनष्ट करते हुए प्रतिष्ठित हैं। जिस विराट् स्वरूप के हृदयरूपी आकाश में 'ब्रह्माण्ड गर्भिणी' (ब्रह्माण्ड को अपने गर्भ में धारण करने वाली) 'सुनाभि' (श्रेष्ठ नाभि-केन्द्र या माया) स्थित है, वह भी आप ही हैं। सूर्यादि (ग्रह-नक्षत्रों) में जो प्रकाशमान रश्मियाँ हैं, वे आपकी ही प्रकाश किरणें हैं ॥ ८ ॥ स सर्ववेत्ता भुवनस्य गोप्ता नाभिः प्रजानां निहिता जनानाम् । प्रोता त्वमोता विचितिः क्रमाणां प्रजापतिश्छन्दमयो विगर्भः ॥ ९ ॥