१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०४ शुकरहस्योपनिषद्
अथ रहस्योपनिषद्द्द्विभागशो वाक्यार्थश्लोकाः प्रोच्यन्ते ॥ ३० ॥ अब रहस्योपनिषद् के वाक्यों के अर्थ वाचक श्लोकों का उपदेश किया जाता है ॥ ३० ॥ येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च । स्वाद्वस्वादु विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम् ॥ प्राणी जिसके द्वारा देखता, सुनता, सूँघता, बोलता और स्वाद-अस्वाद का अनुभव करता है, वह प्रज्ञान कहा जाता है ॥ ३१ ॥ चतुर्मुखेन्द्रदेवेषु मनुष्याश्वगवादिषु । चैतन्यमेकं ब्रह्मातः प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि ॥ ३२ ॥ चतुर्मुख ब्रह्मा, इन्द्रदेव, सम्पूर्ण देवता, मनुष्य, अश्व, गौ आदि पशु और अन्य सभी प्राणियों में एक ही चैतन्य सत्ता- 'ब्रह्म' अवस्थित है, वही प्रज्ञान ब्रह्म मुझमें भी समाया हुआ है ॥ ३२ ॥ परिपूर्णः परात्मास्मिन्देहे विद्याधिकारिणि । बुद्धेः साक्षितया स्थित्वा स्फुरन्नहमितीर्यते ॥ ३३ ॥ यह हमारा शरीर ही परिपूर्ण ब्रह्मविद्या प्राप्ति का अधिकारी है। इसमें साक्षिरूप में अवस्थित परमात्म-बुद्धि के स्फुरित होने पर उसे 'अहं' कहा जाता है ॥ ३३ ॥ स्वतः पूर्णः परात्मात्र ब्रह्मशब्देन वर्णितः । अस्मीत्यैक्यपरामर्शस्तेन ब्रह्म भवाम्यहम् ॥ ३४ ॥ स्वतः स्थापित परिपूर्ण परमात्मा को यहाँ 'ब्रह्म' शब्द से वर्णित किया गया है। 'अस्मि' शब्द से ब्रह्म और जीव की एकता का बोध होता है। इस प्रकार 'मैं ही ब्रह्म हूँ' (यह अर्थ निकलता है।) ॥ ३४ ॥ एकमेवाद्वितीयं सन्नामरूपविवर्जितम् । सृष्टेः पुराधुनाप्यस्य तादृक्त्वं तदितीर्यते ॥ सृष्टि के पूर्व द्वैत के अस्तित्व से रहित, नाम एवं रूप से रहित, एकमात्र, सत्यस्वरूप, अद्वितीय 'ब्रह्म' था तथा वह ब्रह्म अब भी विद्यमान है। वही ब्रह्म 'तत्' पद (तत्त्वमसि) में वर्णित है ॥ ३५ ॥ श्रोतुर्देहेन्द्रियातीतं वस्त्वत्र त्वंपदेरितम् । एकता ग्राह्यतेऽसीति तदैक्यमनुभूयताम् ॥ उपदेशों का श्रवण करने वाले शिष्य के आत्मतत्त्व को, जो शरीर-इन्द्रियों से परे है, 'त्वम्' पद से वर्णित किया गया है। 'असि' पद के द्वारा 'तत्' और 'त्वम्' पदों के वाच्यार्थ ब्रह्म और आत्म तत्त्व के ऐक्य को अनुभव करना चाहिए ॥ ३६ ॥ स्वप्रकाशापरोक्षत्वमयमित्युक्तितो मतम् । अहंकारादिदेहान्तं प्रत्यगात्मेति गीयत ॥ उस ('अयमात्मा ब्रह्म' के अन्तर्गत) स्वप्रकाशित परोक्ष (प्रत्यक्ष शरीर से परे) तत्त्व को 'अयं' पद के द्वारा प्रतिपादित किया गया है। अहंकार से लेकर शरीर तक को प्रत्यक् आत्मा कहा गया है ॥ ३७ ॥ दृश्यमानस्य सर्वस्य जगतस्तत्त्वमीर्यते । ब्रह्मशब्देन तद्ब्रह्म स्वप्रकाशात्मरूपकम् ॥ इस सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् में जो तत्त्व संव्यास है, वह ब्रह्म शब्द से वर्णित किया जाता है। वही ब्रह्म स्वयं प्रकाशित आत्मतत्त्व के रूप में (प्राणियों में) संव्यास है ॥ ३८ ॥ अनात्मदृष्टेरविवेकानिद्रामहं मम स्वप्रगतिं गतोऽहम् । स्वरूपसूर्येऽभ्युदिते स्फुटोक्तेर्गुरोर्महावाक्यपदैः प्रबुद्धः ॥ ३९ ॥ मैं अनात्म पदार्थों में आत्म तुष्टि के कारण अविवेक की निद्रा में, 'मैं,' 'मेरे' की सम्मोहित स्थिति