१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४८ [परिशिष्ट] जरा पर चित्त अपने उत्पत्ति स्थान में स्वयमेव ही शान्त हो जाता है (मैत्रा०४.१)। बुद्धि विषय ग्रहण करने से, चित्त चेतना से, अहन्ता अहंकार से अद्भुत (विशिष्ट) है- बुद्ध्या बुद्ध्यति। चित्तेन चेतयति। अहंकारेणाहंकरोति (ना०प०६.३)। उपनिषद् में चित्तशुद्धि के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि राग-द्वेष आदि से युक्त चित्त ही संसाररूप है, उसके दोषों से मुक्त हो जाने पर मोक्ष की प्राप्ति होना कहा जाता है- चित्तमेव ही संसारो रागादिक्लेशदूषितम्। तदेव तैर्विनिर्मुक्तं भवान्त इति कथ्यते (महो० ४. ६६)। ७५. छन्द - अक्षरों की गणना के अनुसार वैदिक वाक्यों का जो भेद किया गया है, वह छन्द कहलाता है। ऋषियों के अन्तःकरण में प्रस्फुटित मन्त्रों को मूर्त रूप देने का कार्य जिन वर्ण समूहों द्वारा सम्पन्न हुआ, वह छन्द कहलाया। वर्ण समूहों का यह निश्चित परिमाण ही छन्द है। इसके मुख्य सात भेद हैं- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती। इनमें प्रत्येक के आठ-आठ भेद नियत किये गये हैं-आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी, साम्नी, आर्ची और ब्राह्मी। यजुर्वेद को कण्डिकाओं में सात मुख्य छन्द के अतिरिक्त भी कुछ छन्दो को परिगणना की गयी है- अतिजगती, शक्करी, अतिशक्करी, अष्टि, अत्यष्टि, धृति, अतिधृति, कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अभिकृति और उत्कृति। इन वैदिक छन्दों का निर्धारण वर्ण गणना के आधार पर ही हुआ है, इसमें मात्रा अर्थात् लघु-गुरु का विचार नहीं किया गया है। आगे चलकर काव्य में प्रत्येक पाद में मात्राओं के आधार पर छन्दों की व्युत्पत्ति भी हुई है। इन भेदों के आधार पर संस्कृत और हिन्दी भाषा के अनेक छन्दों के अनेक भेदों का वर्णन मिलता है। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार एक समय देवताओं ने मृत्यु के भय से तीनों वेदों में प्रवेश किया और भिन्न-भिन्न छन्दों से अपने को आच्छादित किया। अतः जो आच्छादन करे, वही छन्द है, यही 'छन्दस्' शब्द की व्युत्पत्ति है- देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्रविशंस्ते छन्दोभिरच्छादयन्द्येभिराच्छादयंस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् (छान्दो० १.४.२)। ७६. जगत् - परमात्मा की बनायी यह दुनिया अथवा यह संसार जगत् कहलाता है। यह दृश्य जगत् है, इससे परे अदृश्य जगत् उससे अनन्त गुना व्यापक है। परमात्मा को जगत् ईश, जगत् पति या जगत् पिता भी कहते हैं। जगत् का कारण भी वह ब्रह्म ही है। सूर्य की इस जगत् की आत्मा कहकर निरूपित किया गया है- सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (साम०६२९)। यह सब (जड़-चेतन) की आत्मा (शरीर) जगत् है- सर्वं वा इदमात्मा जगत् (शत०ब्रा०४.५.९.८)। आचार्य शंकर के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। यह जगत् मिथ्या और मायावी है- ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या। जब तक मनुष्य संसार में लिप्त है, तब तक संसार की सत्ता है। जब मोह नष्ट हो जाता है, तब संसार भी नष्ट हो जाता है। आचार्य रामानुज के अनुसार ब्रह्म का शरीर यह जगत् ही है। ब्रह्म ही जगत् रूप में परिणत हुआ है। जगत् सत्य है, मिथ्या नहीं है। दर्शन ग्रन्थ के अनुसार यह जगत् तीन गुणों (सत्, रज, तम) के संयोग का परिणाम है। इस जगत् को अग्निषोमात्मक (अग्नि तथा सोम के संयोग से उत्पन्न) माना गया है- अग्नीषोमात्मकं जगत् (बृ०जा०२.७)। यह सम्पूर्ण जगत् ही ब्रह्म है, इनसे भिन्न कुछ भी नहीं है- सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन (निरा० ९)। ७७. जड़-चेतन - जगत् में हलचल और वृद्धि करने वाले प्राणियों, जीवों आदि को चेतन कहा गया है। निर्जीव तथा निश्चेष्ट पड़े रहने वाले पदार्थों को अचेतन या जड़ कहा गया है। पञ्च भौतिक तत्त्वों से बनी इस सृष्टि को जड़ जगत् कहते हैं। जड़ पदार्थ चेतना विहीन होते हैं। वह परम पुरुष-परमात्मा चेतन है, उसके अंश आत्मा या जीवात्मा भी चेतन हैं। चैतन्यता इसका गुण है। भोजनादि को चेष्टा करने वाले चेतन प्राणियों को 'साशन' और जड़ को 'अनशन' कहा गया है। इन्हें ही जङ्गम और स्थावर कहा जाता है। अचल तथा अपने स्थान पर स्थित रहने वाले पदार्थ स्थावर कहे जाते हैं। इसका विपरीतार्थक जङ्गम है। जड़-चेतन की ही अचर और चर कहा जाता है। जड़ या अचर पदार्थों का एक गुण जड़त्व है, जिसके कारण वे जहाँ के तहाँ पड़े रहते हैं, हिल-डुल नहीं पाते। ७८. जरा - मनुष्य के जन्म के बाद शैशव अवस्था और यौवन अवस्था प्राप्त होती है। यौवन बीतने पर जरा (जीर्णता- शिथिलता) आने लगती है। तत्पश्चात् अन्त में मृत्यु के रूप में शरीर समाप्त होता है- देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा (गी०२.१३)। गीता में भगवान् कहते हैं कि जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि ये जीव के चार दुःख हैं, इनका तथा अपने दोषों का अनुदर्शन मनुष्य की करना चाहिए- जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् (गी०१३.८)।