भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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४५० [परिशिष्ट] तद्वन मांस का शरीर अपने पंचतत्त्वों में विलीन हो जाता है और फिर उसका पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि पुनर्जन्म में जिस कर्म बीज की अनिवार्यता होती है, वह ज्ञानाग्नि से दग्ध हो गया होता है। इस प्रकार वह पूर्ण मुक्त होकर परब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है- यह अवस्था 'विदेह-मुक्त' कहलाती है। इस प्रकार मोक्ष (मुक्ति) के दो रूप होते हैं-१. जीवन-मुक्त तथा २. विदेह मुक्त। ८२. ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग- गीता में प्रमुखतः योग को तीन भागों में विभक्त किया है- १. ज्ञानयोग, २. भक्तियोग और ३. कर्मयोग। इस व्यापक, प्रकाशक, प्रेरक परमात्मा को पा लेना ही योग है। ज्ञान, भक्ति और कर्म ये योग के विविध साधन हैं। परमात्मा को न्यायकारी और सर्वव्यापी अनुभव करना ज्ञानयोग है। परमात्मा के प्रति श्रद्धा-विश्वास तथा प्रेम-आत्मीयता के सूत्रों से जुड़ना भक्तियोग है। फलाकांक्षा को त्यागकर परमात्मा की प्रसन्नता के निमित्त प्रत्येक कर्म को करते रहना कर्मयोग है। कर्मयोग को महत्ता गीता में इस प्रकार दो गई है कि संन्यास और कर्मयोग दोनों निःश्रेयस प्रदान करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में कर्म-संन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है- संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयस्करावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ (गी०५.२) कुछ विद्वान् कर्म को बन्धन का कारण मानते हैं, परन्तु जो कर्म ज्ञानपूर्वक, भक्तिभाव पूर्वक तथा आसक्ति से रहित होकर किया जाता है, उसे बन्धन रूप नहीं माना गया है, वह तो मुक्ति का आधार स्वरूप है। श्रुति कहती है- कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत १४ समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे । (यजु०४०.२) ८३. ज्ञान-विज्ञान - मनुष्य में अनेक अपूर्णताएँ होती हैं, इन्द्रिय लिप्सा-लालसा, विषय-विकार आदि होते हैं, ज्ञान से विकारों, लालसाओं से निवृत्ति और पूर्णता को प्राप्ति होती है। ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती । ( ऋते ज्ञानान्नमुक्तिः)। गुरु के प्रति श्रद्धा भाव और सेवा से तथा स्वयं के अध्यवसाय से ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान के सदृश पवित्र वस्तु कोई नहीं है, यह गीता का निर्देश है- न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते (गी० ४.३८)। सांसारिक वस्तुओं से सम्पन्न होने वाले यज्ञ से ज्ञानरूप यज्ञ सब प्रकार से श्रेष्ठ है- श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप (गी०४.३३)। ज्ञान की नौका द्वारा सारे पापों को पार किया जा सकता है- सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि (गी०४.३६)। ज्ञानरूप अग्नि समस्त कर्मों को भस्म कर देती है- ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा (गी०४.३७)। तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष श्रद्धावान् होकर ज्ञान को प्राप्त करता है-श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति (गी० ४.३९)। विज्ञान से तात्पर्य विशिष्ट ज्ञान से है। किसी विशिष्ट विषय के तत्त्वों या सिद्धान्तों का क्रमबद्ध संगृहीत ज्ञान, विज्ञान कहलाता है। विषय ग्रहण के कारण को विज्ञान कहा गया है-गृह्णन्ति विषयान् येन विज्ञानं हि तदुच्यते। आज जिसे हम 'विज्ञान' के नाम से जानते हैं, वह हमें विविध विषयों का क्रमबद्ध कार्य- कारणता से युक्त ज्ञान कराता है, इसलिए 'विज्ञान' कहा जाता है। तर्क, तथ्य, प्रमाण को कसौटी पर खरा उतरने वाला ज्ञान 'विज्ञान' है। ८४. तद्वन - वेदान्त दर्शन का यह शब्द 'ब्रह्म और उसके प्रति कर्त्तव्य भाव' को प्रकट करता है। केनोपनिषद् खण्ड चार के छठें मन्त्र में यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। आचार्य शंकर ने इस शब्द का भाष्य करते हुए लिखा है- तद् ब्रह्म ह किल तद्वनं नाम तस्य वनं तद्वनं तस्य प्राणिजातस्य प्रत्यगात्मभूतत्वाद्धनं वननीयं संभजनीयम्। अर्थात् वह 'ब्रह्म' निश्चय ही 'तद्वन' नाम वाला है। उसका वन-तद्वन, यह उस प्राणि-समूह का प्रत्यगात्मस्वरूप होने के कारण वन- वननीय- है, भजनीय है। वस्तुतः जहाँ यह शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसके पूर्व यह बतलाया गया है कि साधारण लोग जिस ब्रह्म को उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है, इससे लोग यह न समझें कि ब्रह्म की उपासना हो ही नहीं सकती; इस कारण ऋषि इस स्थल पर यह दिखलाते हैं कि उस परमब्रह्म परमात्मा को 'वन' रूप में समझा जाए अर्थात् वह ब्रह्म ऐसा है कि जिसका सम्यक् रूप से अच्छी तरह से भजन (अनुभव) किया जा सकता है। परमशान्ति देने वाला अर्थात् वननीय वही है। 'वन' का एक अर्थ जल भी है। जो गर्मी को - ताप को शान्त करता है, हृदय को शान्ति देता है- वह जल है, रस है- 'रसोऽहमप्सु कौन्तेय' (गी०७.८) अर्थात् जल में जो रस है, वह मैं हूँ। तैत्तिरीय उपनिषद् में भी ब्रह्म को रस रूप कहा गया है- रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति (तैत्ति० २.७)। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि उसी (दिव्य) रस को -आनन्द को -'वन' अर्थात् प्राप्त होने योग्य वस्तु रूप में कहा गया है।