भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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४६६ | परिशिष्ट | ब्रह्माण्ड १५०. ब्रह्मनिष्ठ — द्र०-ब्रह्मविद्या। १५१. ब्रह्मरन्ध्र — मस्तक या मूर्धा भाग के मध्य एक गुप्त छिद्र जिससे होकर प्राण निकलने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। योगियों के प्राण इसी छिद्र (रन्ध्र) से निकलते हैं। इसे मोक्ष द्वार कहा गया है, क्योंकि इसे बेधकर प्राण त्यागने से मुक्ति प्राप्त होती है। इसे सुषिर (छिद्रयुक्त, पोला) मण्डल भी कहा जाता है- मोक्षद्वारं बिलं चैव सुषिरं मण्डलं विदुः (अमृ० २६)। जिस साधक का प्राण इस मण्डल को भेदकर मूर्धा में पहुँच जाता है, वह जहाँ कहीं भी मृत्यु को प्राप्त होता है, पुनः जन्म नहीं लेता, अर्थात् पुनर्जन्म के चक्र में नहीं फँसता- यस्येदं मण्डलं भित्त्वा मारुतो याति मूर्धनि। यत्र-यत्र म्रियेद्वापि न स भूयोऽभिजायते (अमृ० ३९)। १५२. ब्रह्मलोक — द्र०-देवयान। १५३. ब्रह्मविद्या — उपनिषदों में मुख्यतः जिस विद्या का उल्लेख है, उसे ब्रह्मविद्या कहा जाता है। जिसका तात्पर्य है- ब्रह्म का ज्ञान कराने वाली विद्या। ब्रह्म के जानने वाले को ब्रह्मविद् या ब्रह्मवेत्ता कहा जाता है। ब्रह्मविद्या के द्वारा 'हम सर्व हो जायेंगे', ऐसा मनुष्य मानते हैं- तदाहुर्यद् ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते (बृह०१.४.९)। ब्रह्मविद्या को सब विद्याओं की आधारभूता कहा गया है, जिसका उपदेश ब्रह्माजी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को दिया- स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह (मुण्ड० १.१.१)। ब्रह्मविद्या के प्रति एकनिष्ठ पुरुष को ब्रह्मनिष्ठ कहा जाता है अथवा ब्राह्मणवृत्ति या ब्रह्मज्ञान से सुसम्पन्न पुरुष को ब्रह्मनिष्ठ कहते हैं। अन्य विद्याओं का भली प्रकार प्राप्त हुआ ज्ञान भी नाशवान् है, किन्तु ब्रह्मविद्या का भली-भाँति ज्ञान स्थिर ब्रह्म को प्राप्त कराने में समर्थ है- अन्यविद्यापरिज्ञानमवश्यं नश्वरं भवेत्। ब्रह्मविद्यापरिज्ञानं ब्रह्मप्राप्तिकरं स्थितम् (शु०२०)। १५४. ब्रह्मवेत्ता — ब्रह्मवेत्ता का सामान्य अर्थ है- ब्रह्म को जानने या समझने वाला। ब्रह्म की सर्वत्र अनुभूति करने वाला। दूसरे अर्थ में वेदों के अर्थ के ज्ञाता को भी ब्रह्मवेत्ता कहा गया है। इन्हें ब्रह्मज्ञानी अथवा तत्त्वज्ञानी कहकर भी निरूपित किया जाता है, क्योंकि ये ब्रह्मतत्त्व के ज्ञाता होते हैं। गीता में भगवान् ने कहा है कि स्थिर बुद्धि और मोह रहित ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म में स्थित होते हैं- स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः (गी०५.२०)। जो कर्मयोगी आत्मा में ही क्रीड़ा करता है, उसी में रमण करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ कहा गया है- आत्मक्रीडा आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः (मुण्ड० ३.१.४)। १५५. ब्रह्मा — ब्रह्म के तीन सगुण रूप माने गये हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ब्रह्म के सगुण रूपों में से एक रूप जो सृष्टि की रचना के लिए नियत है, उन्हें ब्रह्मा कहा गया है। पुराणों में वेदों के भी प्रकटकर्त्ता इन्हें ही माना गया है। यज्ञ के एक ऋत्विज् जिन्हें यज्ञ के प्रत्यक्ष संरक्षणकर्त्ता के रूप में नियत किया जाता है, उन्हें भी ब्रह्मा कहा जाता है। ब्रह्मा को ही विधाता, पितामह, प्रजापति तथा हिरण्यगर्भ आदि विशेषणों से भी निरूपित किया गया है। पुराणों के अनुसार विष्णुदेव की नाभि से ब्रह्मा स्वयं उत्पन्न हुए, इसलिए ये स्वयंभू कहलाये। सम्पूर्ण कलाएँ, विद्याएँ और ब्रह्माण्ड इन्हीं से प्रकट माना गया है। ब्रह्मा की पत्नी 'ब्रह्माणी' के रूप में मान्य हैं। मुण्डकोपनिषद् के अनुसार देव ब्रह्मा सम्पूर्ण जगत् की रचना करने वाले और लोकों के रक्षक हैं, वे देवों में सबसे पहले प्रकट हुए। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया- ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता। स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह (मुण्ड० १.१.१)। १५६. ब्रह्माण्ड — धार्मिक-दार्शनिक ग्रन्थों में प्रायः चौदह भुवनों का उल्लेख मिलता है। हम लोग जहाँ विद्यमान हैं, वह 'भू' लोक है। यह तथा इसके ऊपर सात लोक हैं तथा इसके नीचे सात लोक हैं। ये चौदह लोक मिलकर ब्रह्माण्ड कहलाते हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक रामतीर्थ ने लिखा हैं कि ब्रह्माण्ड में जो चौदह लोक हैं, उन्हें लोकालोक नामक पर्वत आवृत किये हुए है। इस पर्वत के बाहर की ओर पृथिवी है और पृथिवी के चारों ओर उसे समुद्र घेरे हुए हैं। इस प्रकार लोकालोक पर्वत से घिरे चौदह भुवन जिनके अन्तर्गत पृथिवी और समुद्र हैं- ये सब मिलकर एक ब्रह्माण्ड बनता है- एत एव स्वावरण भूतलोकालोक पर्वतात्तद्बाह्या पृथिवी तद्बाह्या समुद्रैः सहिता ब्रह्माण्डमित्युच्यते (वे० १६ विद्वन्मनोरंजिनी)। 'ब्रह्माण्ड' का परिमाण अतिबृहद् है। बृहदारण्यक उपनिषद् में इसका वर्णन इस प्रकार है- यह लोक ३२ देवरथाह्न है। इस लोक की पृथिवी और पृथिवी को समुद्र घेरे हुए है। देवरथाह्न्य का तात्पर्य है एक दिन में सूर्य

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