१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयज्ञ-अग्निहोत्र परिशिष्ट ४७१ सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजसी पुरुष यक्ष और राक्षसों की पूजते हैं- यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः (गी०१७.४)। १८०. यज्ञ-अग्निहोत्र — भारतीय संस्कृति का प्रमुख वैदिक कृत्य जिसमें अग्नि प्रज्वलित कर हव्य पदार्थों की आहुति देते और इष्ट देवों को प्रार्थनाएं किया करते हैं। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त संस्कारों को परम्परा के साथ हवन-यज्ञ किया करते हैं। इसके पर्यायवाची शब्दों में अध्वर, क्रतु, इष्टि, सवन, हवन, होम, अग्निहोत्र आदि हैं। यज्ञ की व्यवस्था करने वाले यजमान तथा यज्ञ कराने वाले ऋत्विज् कहलाते है। यजुर्वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों और श्रौत सूत्रों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का उल्लेख हुआ है- सोमयाग, अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ, ऋतुयाज, अग्निष्टोम, अतिरात्र, दशरात्र, दर्शपूर्णमास, पवित्रेष्टि, पुत्रकामेष्टि, चातुर्मास्य, सौत्रामणि, पुरुषमेध आदि। ये यज्ञ तीन प्रकार के माने जाते हैं- १. पाक यज्ञ- औपासन होम, वैश्वदेव, अष्टका आदि, २. हविर्यज्ञ- अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, आग्रायणेष्टि, चातुर्मास्य आदि, ३. सोमयज्ञ- अग्निष्टोम, वाजपेय, अतिरात्र आदि । निरुक्त के अनुसार यजन कर्म यज्ञ है- यज्ञः कस्मात् ? प्रख्यातं यजतिकर्मेति नैरूक्ताः । याज्यो भवतीति वा (निरु०३.१९)। निरुक्त के अनुसार यज्ञ के १५ नाम हैं- यज्ञ, वेन, अध्वर, मेध इत्यादि । सम्पूर्ण यज्ञ कर्म अग्निहोत्र में सम्पन्न होते हैं- अग्निहोत्रे वै सर्वे यज्ञक्रतवः (मै०ब्रा०१.८.६)। सम्पूर्ण लोक यज्ञ को धुरी या यज्ञ के आधार पर अवलम्बित है। अतः यज्ञ को इस लोक का केन्द्र कहा गया है- अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः (यजु०२३.६२)। यज्ञ को देवों को आत्मा कहकर स्वीकार किया गया है- यज्ञो वै देवानामात्मा (शत०ब्रा०९.३.२.७)। श्रेष्ठतम कर्म को यज्ञ की संज्ञा से निरूपित किया गया है- यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म (शत०ब्रा०१.७.१.५)। अग्निहोत्र को महत्ता छान्दोग्य में वर्णित है, जिस प्रकार क्षुधित बालक माता की यथायोग्य उपासना करते हैं, उसी प्रकार सभी प्राणी अग्निहोत्र की उपासना करते हैं- यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते। एवंसर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासते (छान्दो० ५.२४.५)। गीता में कहा गया है कि वह सर्वव्यापी ब्रह्म यज्ञ में ही प्रतिष्ठित है- तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् (गी०३.१५)। १८१. यज्ञोपवीत-उपनयन — यज्ञोपवीत का सामान्य शब्दार्थ-यज्ञ का उपवीत (वस्त्र) है। यह यज्ञार्थक जीवन का एक प्रतीक है। यह एक संस्कार परम्परा द्वारा पहनाया जाता है। बालक को गुरुकुल में ले जाने के समय यज्ञोपवीत संस्कार कराया जाता था। ऐसी मान्यता है कि इससे बालक का दूसरा जन्म होता है, इसके बाद वह सूक्ष्म ज्ञान और संस्कार की ग्रहण करने में समर्थ हो जाता है। याज्ञ० स्मृति के अनुसार बालक के ज्ञान, शौच और आचार का विकास कराना-यह उपनयन का उद्देश्य है- उपनीय गुरुः शिष्यं महाव्याहृतिपूर्वकम्। वेदमध्यापयेदेनं शौचाचारांश्च शिक्षयेत् (या०स्मृ०१.१५) । आचार्य महाव्याहृतिपूर्वक गायत्री मंत्र के उच्चारण के द्वारा शिष्य का उपनयन करता है। गायत्री मंत्र में नौ शब्द हैं। यज्ञोपवीत की तीन लड़ों में तीन-तीन धागे होते हैं, इस प्रकार नौ सूत्रों से यज्ञोपवीत बनता है। इसे व्रतबन्ध भी कहते हैं। उपवीतधारी को नौ गुणों या व्रतों के बन्धन से बाँधते हैं। उपनयन न होने से व्यक्ति व्रात्य अर्थात् पतित और समाज से बहिष्कृत माना जाता था। यह सूत्र योगी, योग-वेत्ता और तत्त्वदर्शियों को धारण करना चाहिए-तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगवित्तत्त्वदर्शिवान् (ब्रह्म० ८)। जो इस सूत्र को ब्रह्म भाव से धारण करता है, वही चैतन्य है- ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः स चेतनः (ब्रह्म० ८)। ज्ञानरूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले पुरुषों के हृदय में ब्रह्मरूप सूत्र रहता है- सूत्रमन्तर्गतं येषां ज्ञानयज्ञोपवीतिनाम् (ब्रह्म० १०)। १८२. यति — द्र०- संन्यासी। १८३. याज्या-शस्या-शस्त्र — यज्ञ संबंधी सूक्त ऋचा अथवा मंत्र को याज्या कहते हैं और वेद की ऋचा को शस्या कहते हैं। परवर्ती संहिताओं तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में इसका उल्लेख मिलता है- इयं (पृथिवी) हि याज्या (शत० ब्रा० १.४.२.१९)। अन्नं वै याज्या (गो०ब्रा० २.३.२२)। होता जिन मंत्रों से स्तुति करता है, उसे शस्त्र कहते हैं। उद्गाता द्वारा उच्चारित मन्त्र स्तोत्र कहे गये हैं। साम को देवरूप और शस्त्र को प्रजारूप मानकर निरूपण किया गया है-साम वै देवाः प्रजाः शस्त्राणि (जै०ब्रा० १.२७७)। कहीं वाणी को ही शस्त्र स्वीकार किया गया है-वाग्वि शस्त्रम् (ऐ० ब्रा० ३.४४) १८४. योग — योग के पर्यायवाची शब्द हैं- जोड़ना, मिलाना, संयोग, संबंध, संगति, ध्यान, युक्ति, चित्तवृत्ति का निरोध आदि। योग के व्यवहारतः विविध भेद हैं; जैसे- मंत्रयोग, लययोग, हठयोग, राजयोग आदि- योगो हि बहुधा