भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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४८६ [परिशिष्ट] स्वयम्भू-परिभू च जायते (मुण्ड०१.१.९)। उपनिषद् का कथन है कि जिससे ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिसके सहारे जीवित रहते हैं और अन्त में जिसमें विलीन हो जाते हैं, वह ब्रह्म है-यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्मेति (तैत्ति०३.१.१)। वह ब्रह्म जगत् की रचना कर उसमें अनुप्रविष्ट हो गया-तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् (तैत्ति०२.६.१)। कुछ विद्वानों का मत है कि भगवान् ने अपनी योगमाया से सृष्टि की रचना को। कुछ इसे जड़-चेतन के संयोग या पुरुष-प्रकृति के संयोग से उद्भूत मानते हैं। उत्कृष्ट सृष्टि या उत्कृष्ट रचना की अतिसृष्टि कहा गया है। २५३. सोऽहं— जीव और ब्रह्म की एकता या अभेदता को प्रदर्शित करने वाले अनेक वाक्य वेदान्त शास्त्र में दृष्टिगोचर होते हैं। जीव अज्ञान भाव से ग्रसित होकर अपने को ब्रह्म से पृथक् समझने लगता है। सोऽहं, शिवोऽहं, तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि प्रभृति वाक्यों के उपदेश वेदान्त शिक्षा में मिलते हैं। ये भाव अनुभूति के स्तर पर आने से ही इनसे अज्ञान तिमिर का नाश होता है। सोऽहं साधना से साधक को 'जीवो ब्रह्मैव नापरः' तथ्य का बोध हो जाता है। वह चैतन्य ईश्वर 'सोऽहं' स्वरूप में एक होते पर भी शरीरों की भिन्नता के कारण वह 'जीव' बहुविध बन जाता है- सोऽहमेकोऽपि देहारम्भक भेदवशाद्बहुजीवः (निरा०५)। यह देह ही देवालय है, उसमें जीव केवल शिव ही है। जब मनुष्य का अज्ञानरूप निर्माल्य दूर हो जाता है, तब 'सोऽहं' भाव से उसको पूजना चाहिए- देहो देवालयः प्रोक्तः स जीवः केवलः शिवः। त्यजेदज्ञान निर्माल्यं सोऽहंभावेन पूजयेत् (स्क०१०)। २५४. स्तोम— स्तोम शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं-स्तुति, गुणगान, यज्ञ, समूह, राशि। वैदिक संहिताओं में प्रायः देवों के प्रति स्तोम ही संगृहीत हैं। साम गान के अन्तर्गत स्तुतिपरक छन्दों को स्तोम कहा गया है। इस तथ्य की पुष्टि निम्न प्रतिपादन से होती है-यद्यूचि तद्गेथा३ इति स्तोमो वा एष तस्य साम्नो यद्गयं सामोपास्मह इति (जैमि०१.४३.६)। स्तोम को प्रतिहार और छन्द को निधनरूप माना गया है-ऋचः प्रस्तावं सामान्युद्गीथं स्तोमं प्रतिहारं छन्दो निधनम् (जैमि०१.१३.३)। २५५. स्थितता— अपने ही हृदय की दिव्य भावनाओं में सन्तुष्ट एवं शान्त बने रहने वाले साधक को स्थिति को 'स्थितता' कहा जा सकता है। ऐसा साधक किसी भी भौतिक लिप्सा-लालसा से दूर रहता है और किसी भी बाह्य सुख की अपेक्षा नहीं करता। उपनिषद् में जनक-याज्ञवल्क्य संवाद में राजा जनक पूछते हैं-हे याज्ञवल्क्य! स्थितता क्या है? हे सम्राट्! हृदय ही स्थितता है-ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा (बृह०४.१.७)। स्थिर प्रज्ञा या बुद्धि वाले साधकों को गीता में स्थितप्रज्ञ या स्थितधी कहकर निरूपित किया गया है। गीता के अनुसार जब साधक मन में स्थित कामनाओं को त्याग देता है, तब आत्मा से हो आत्मा में सन्तुष्ट हुआ वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है-प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञः तदोच्यते (गी०२.५५)। २५६. स्वधा— द्र०-स्वाहा। २५७. स्वप्न— निद्रावस्था में कुछ मूर्तियों, चित्रों, व्यक्तियों और विचारों आदि का सम्बद्ध या असम्बद्ध श्रृंखला का मन में आना या कोई घटना आदि दिखाई देना स्वप्न कहलाता है। ऋग्वेद तथा अन्य संहिताओं में स्वप्न का उल्लेख हुआ है। ऋ०२.५८.१० में दुःस्वप्न का वर्णन है। ब्रह्मवैवर्त पुराण (अ० ७७) में शुभाशुभ स्वप्नफल का विस्तृत वर्णन है। रात्रि में स्वप्नावस्था में पितृराज मनुष्यों में प्रविष्ट होते हैं-अश्मसु सोमो राजा निशायां पितृराजः स्वप्ने मनुष्यान् प्रविशसि पयसा पशून् (जैमि०४.५.२)। जाग्रत् अवस्था और उसके अधिष्ठाता की स्थिति नेत्र के भीतर है। स्वप्न और उसके अधिष्ठाता तैजस का कण्ठ में समावेश है। सुषुप्ति और उसके अधिष्ठाता प्राज्ञ हृदय में स्थित हैं और तुरीय परमात्मा मूर्धा (मस्तिष्क) में स्थित हैं- नेत्रस्थं जागरितं विद्यात् कण्ठे स्वप्नं समाविशेत्। सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि संस्थितम् (ना०प०५.२५)। जैसे स्वच्छ दर्पण में वस्तु स्पष्ट दीखती है, वैसे शुद्ध अन्तःकरण में परमात्मा के दर्शन होते हैं। जैसे स्वप्न में वस्तु अस्पष्ट दीखती है, वैसे ही पितृलोक में परमात्मा - यथाऽऽदर्शे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके (कठ०२.३.५)। २५८. स्वयम्भू-परिभू— स्वयम्भू का शाब्दिक अर्थ है, जो स्वयं उत्पन्न हुआ हो-ब्रह्मा,विष्णु,शिव,बुद्ध,कामदेव आदि देवों को स्वयम्भू कहा गया है। यह शब्द ईश्वर के विशेषण रूप में प्रयुक्त होता है। इसी रूप में 'परिभू' शब्द भी है, जिसका अर्थ है-जो चारों ओर से आच्छादित किये हो। प्रथम मनु को भी स्वयम्भू या स्वयम्भुव कहा गया है।