१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ
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४९३ मन्त्रानुक्रमणिका
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| अयमग्निवैश्वानरो | बृह० ५.९.१ | अस्तीत्येवोपलब्ध- | कठ० २.३.१३ |
| अयमग्निः सर्वेषां भूतानाम् | बृह० २.५.३ | अस्य यदेकाः शाखाम् | छान्दो० ६.११.२ |
| अयमाकाशः सर्वेषाम् | बृह० २.५.१० | अस्य लोकस्य का | छान्दो० १.९.१ |
| अयमात्मा सर्वेषां भूतानाम् | बृह० २.५.१४ | अस्य विस्रंसमानस्य | कठ० २.२.४ |
| अयमादित्यः सर्वेषाम् | बृह० २.५.५ | अस्य सोम्य महतो | छान्दो० ६.११.१ |
| अयं वाव खल्वस्य | मैत्रा० ४.३ | अहमन्नमहमन्नमन्न- | तैत्ति०३.१०.६ |
| अयं वाव लोको | छान्दो० १.१३.१ | अहरेव सविता | गाय० ३.६ |
| अयं वाव स ......पुरुष | छान्दो० ३.१२.८ | अहर्वा अश्वं पुरस्तात् | बृह० १.१.२ |
| अयं वाव स ......हृदय | छान्दो० ३.१२.९ | अह्निकेति होवाच | बृह० ३.९.२५ |
| अयं वायुः सर्वेषाम् | बृह० २.५.४ | अहं वृक्षस्य रेरिवा | तैत्ति०१.१०.१ |
| अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम | बृह० ६.२.११ | अहोरात्रो वै प्रजापतिः | प्रश्न० १.१३ |
| अयः स्तनयित्नुः सर्वेषाम् | बृह० २.५.९ | आकाश एव यस्याय | बृह०३.९.१३ |
| अरण्योर्निहितो | कठ० २.१.८ | आकाशो वाव तेजसो | छान्दो० ७.१२.१ |
| अरा इव रथनाभौ कला | प्रश्न० ६.६ | आकाशो वै नाम | छान्दो० ८.१४.१ |
| अरा इव रथनाभौ प्राणे | प्रश्न० २.६ | आगमस्याविरोधेन | अमृ० १७ |
| अरा इव स्थनाभौ संहता | मुण्ड० २.२.६ | आगाता ह वै कामानां | छान्दो०१.२.१४ |
| अरिष्टं कोशम् | छान्दो० ३.१५.३ | आग्नि वेश्यादाग्निवेश्यो | बृह०४.६.२ |
| अविद्यायां बहुधा | मुण्ड० १.२.९ | आग्निवेश्यादाग्निवेश्यः | बृह० २.६.२ |
| अविद्यायामन्तरे | मुण्ड० १.२.८ | आज्ञाभय....बन्धः | निरा० २५ |
| अविद्यायामन्तरे | कठ० १.२.५ | आत्मन एष प्राणो | प्रश्न० ३.३ |
| अव्यक्तात्तु | कठ० २.३.८ | आत्मानं चेद्विजानीयाद० | बृह०४.४.१२ |
| अविः संनिहितम् | मुण्ड० २.२.१ | आत्मानमन्तत उपसृत्य | छान्दो० १.३.१२ |
| अशक्यः सोऽन्यथा | मन्त्रि० ३ | आत्मानं रथिनं | कठ० १.३.३ |
| अशनापिपासे मे सोम्य | छान्दो० ६.८.३ | आत्मानं सततं | ना० बि० २१ |
| अशनायापिपासा. | मुद्ग० ४.७ | आत्मा वा इदमेक | ऐत० १.१.१ |
| अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं | कठ० १.३.१५ | आत्मेश्वर जीवः | सर्व० २ |
| अशरीर शरीरेषु | कठ० १.२.२२ | आत्मैवेदमग्र आसीत् | बृह० १.४.१ |
| अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत् | छान्दो० ८.१२.२ | आत्मैवेदमग्र आसीदेक | बृह० १.४.१७ |
| अशीतिश्च शतम् | अमृ० ३४ | आत्रेयी पुत्रादात्रेयीपुत्रो | बृह० ६.५.२ |
| अष्टपादं शुचिम् | मन्त्रि० १ | आदित्यवस्य रेतसः | छान्दो० ३.१७.७ |
| असद्वा इदमग्र | तैत्ति० २.७.१ | आदित्य इति होवाच | छान्दो० १.११.७ |
| असन्नेव स भवति | तैत्ति० २.६.१ | आदित्य ऊकारो | छान्दो० १.१३.२ |
| असिपद महामन्त्रस्य | शु०२० २७ | आदित्य एव सविता | गाय० ३.४ |
| असूर्या नाम ते | ईश० ३ | आदित्यमथ वैश्वदेवम् | छान्दो० २.२४.१३ |
| असौ वा आदित्यो | छान्दो० ३.१.१ | आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः | छान्दो० ३.१९.१ |
| असौ वाव लोको | छान्दो० ५.४.१ | आदित्यो ह वै प्राणः | प्रश्न० १.५ |
| असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम | बृह० ६.२.९ | आदित्यो ह वै बाह्यः | प्रश्न० ३.८ |
| अस्तमित आदित्ये.... चन्द्रः | बृह० ४.३.४ | आदिरिति द्वयक्षरम् | छान्दो० २.१०.२ |
| अस्तमित आदित्ये याज्ञ- | बृह० ४.३.३ | आदिः स संयोग- | श्वेता० ६.५ |
| अस्तमित आदित्ये.... शान्ते- | बृह० ४.३.६ | आदौ जलधिजीमूतभेरी | ना० बि० ३४ |
| अस्तमित आदित्ये.... शान्ते | बृह० ४.३.५ | आनन्दो ब्रह्मेति | तैत्ति० ३.६.१ |
| अस्ति खल्वन्योऽपरो | मैत्रा०३.२ | आप एव ... हृदयम | बृह० ३.९.१६ |