१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ
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४९५ मन्त्रानुक्रमणिका
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| एको देवो बहुधा | मुद्ग० ३.१ | एवमेषां लोकानामासाम् | छान्दो० ४.१७.८ |
| एको वशी | कठ० २.२.१२ | एवं यथाश्मानमाखणमृत्वा | छान्दो० १.२.८ |
| एको वशी निष्क्रियाणाम् | श्वेता० ६.१२ | एवं महावाक्या | शु० २० ३० |
| एको ह ऽ सो भुवन. | श्वेता० ६.१५ | एवः सोम्य ते षोडशानाम् | छान्दो० ६.७.६ |
| एको हि रुद्रो | श्वेता० ३.२ | एष उ एव बृहस्पति. | बृह० १.३.२० |
| एतच्छ्रुत्वा | कठ० १.२.१३ | एष उ एव ब्रह्मणस्पति. | बृह० १.३.२१ |
| एतज्ज्ञेयम् | श्वेता० १.१२ | एष उ एव भामनीरेष हि | छान्दो० ४.१५.४ |
| एतत्तुल्यं | कठ० १.१.२४ | एष उ एव वामनीरेष हि | छान्दो० ४.१५.३ |
| एतदालम्बन ऽ | कठ० १.२.१७ | एष उ एव साम वाग्वै | बृह० १.३.२२ |
| एतद्ध वै तज्जनको | बृह० ५.१४.८ | एष उ वा उद्गीथः | बृह० १.३.२३ |
| एतद्धस्म वै तद्विद्वान्. | बृह० ६.४.४ | एष तु वा अतिवदति | छान्दो० ७.१६.१ |
| एतद्धस्म वै तद्विद्वानाह | छान्दो० ३.१६.७ | एष तेऽग्निर्नचिकेत | कठ० १.१.१९ |
| एतद्धस्म वैतद्विद्वांसः | छान्दो० ६.४.५ | एष देवो विश्वकर्मा | श्वेता० ४.१७ |
| एतद्ध स्मैत. | गाय० ३.१३ | एष प्रजापतिर्यङ्ग. | बृह० ५.३.१ |
| एतद्ध स्मैतद् | गाय०१.१ | एष ब्रह्मैष इन्द्र | ऐत० ३.१.३ |
| एतद्धयेवाक्षरं | कठ० १.२.१६ | एष म आत्मान्तर्हृदये | छान्दो० ३.१४.३ |
| एतद्योगेन परम पुरुषो | मुद्ग० ४.९ | एष वै यजमानस्य | छान्दो० २.२४.१५ |
| एतद्वस्तुचतुष्टयं | सर्व० १३ | एष सर्वेश्वर एष | माण्डू० ६ |
| एतद्वै परमं तपो | बृह० ५.११.१ | एष सर्वेषु भूतेषु | कठ० १.३.१२ |
| एतमु एवाहमभ्य... प्राणा | छान्दो० १.५.४ | एष ह वा उदक्प्रवणो | छान्दो० ४.१७.९ |
| एतमु एवाहमभ्य...रश्मी | छान्दो० १.५.२ | एष ह वै यज्ञो योऽयम् | छान्दो० ४.१६.१ |
| एतमु हैव चूलो | बृह० ६.३.१० | एष हि खल्वात्मेशानः | मैत्रा० ५.८ |
| एतमु हैव जानकिराय | बृह० ६.३.११ | एष हि द्रष्टा | प्रश्न० ४.९ |
| एतमु हैव मधुकः | बृह० ६.३.९ | एषां भूतानां पृथिवी रसः | छान्दो० १.१.२ |
| एतमु हैव वाजसनेयो | बृह० ६.३.८ | एषां वै भूतानां | बृह० ६.४.१ |
| एतमु हैव सत्यकामो | बृह० ६.३.१२ | एषामज्ञानजन्तूनां | निरा० २ |
| एतम्मृग्वेदमम्यतपत् स्तस्याभि० | छान्दो० ३.१.३ | एषोऽग्निस्तपत्येष | प्रश्न० २.५ |
| एतः संयद्वाम इत्याचक्षत | छान्दो० ४.१५.२ | एषोऽणुरारत्मा चेतसा | मुण्ड० ३.१.९ |
| एतस्माज्जायते | मुण्ड० २.१.३ | एषो ह देवः प्रदिशो | श्वेता० २.१६ |
| एतस्य वा अक्षरस्य | बृह० ३.८.९ | एह्येहीति तमाहुतय | मुण्ड० १.२.६ |
| एतेन जीवात्मनोर्योगेन | मुद्ग० २.६ | ओङ्काररथमारुह्य | अमृ० २ |
| एतेनैव च मन्त्रेण | मुद्ग० १.४ | ओ३मदा३मो | छान्दो० १.१२.५ |
| एतेषां मे देहीति | छान्दो० १.१०.३ | ओमिति ब्रह्म | तैत्तिरीय० १.८.१ |
| एतेषु यश्चरते | मुण्ड० १.२.५ | ओमित्येकाक्षरम् | प्रण० २ |
| एवं बद्धस्तथा जीवः | स्कन्द० ७ | ओमित्येकाक्षरम् ब्रह्म | अमृ० २१ |
| एवमेव खलु सोम्य. | छान्दो० ६.६.२ | ओमित्येतदक्षरमिदं | माण्डू० १ |
| एवमेव खलु सोम्येमाः | छान्दो० ६.१०.२ | ओमित्येतदक्षरमुद्गीथम् | छान्दो० १.१.१ |
| 'एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच | छान्दो० १.१०.११ | ओममित्येतदक्षर.....ह्युद्गायति | छान्दो० १.४.१ |
| एवमेवैष मघवन्निति | छान्दो० ८.९.३ | औपमन्यव कं त्वमात्में. | छान्दो० ५.१२.१ |
| एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं | छान्दो० ८.११.३ | कं ते कामपागायानी नील्येष | छान्दो० १.७.९ |
| एवमेवैष सम्प्रसादो. | छान्दो० ८.१२.३ | कतम आत्मेति योऽयम् | बृह० ४.३.७ |
| एवमेवोद्गातारमुवाच. | छान्दो० १.१०.१० | कतम आदित्या इति | बृह० ३.९.५ |