१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ
पृष्ठ 494, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 494
मन्त्रानुक्रमणिका ५००
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| तालमात्रविनिष्कम्पो | अमृ० २४ | ते होचुर्भगवन्यद्येवम् | मैत्रा० ३.१ |
| तावद्रथेन गन्तव्यम् | अमृ० ३ | ते होचुर्येन हैवाथैन | छान्दो० ५.११.६ |
| ता वा अस्यैता हितो | बृह० ४.३.२० | तौ वा एतौ द्वौ | छान्दो० ४.३.४ |
| तावानस्य महिमा | छान्दो० ३.१२.६ | तौहद्वात्रिंशतं वर्षाणि | छान्दो० ८.७.३ |
| तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकाम्.. | छान्दो० ६.३.३ | तौ ह प्रजापतिरुवाच | छान्दो० ८.७.४ |
| तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां नु | छान्दो० ६.३.४ | तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलङ्कृतौ | छान्दो० ८.८.२ |
| तिर्यगूर्ध्वमधोदृष्टिं | अमृ० २३ | तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिः | छान्दो० ८.८.४ |
| तिलेषु तैलम् | श्वेता० १.१५ | तौ होचतुर्यथैवेद० | छान्दो० ८.८.३ |
| तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः | प्रश्न० ५.६ | त्रयं वा इदं नाम रूपम् | बृह० १.६.१ |
| तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे | कठ० १.१.९ | त्रयः प्राजापत्याः | बृह० ५.२.१ |
| तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद | केन० ३.३ | त्रयी विद्या हिङ्कारस्त्रयः | छान्दो० २.२१.१ |
| तेजसः सोम्याश्यमानस्य | छान्दो० ६.६.४ | त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञः | छान्दो० २.२३.१ |
| तेजो वावादित्ये भूयः | छान्दो० ७.११.१ | त्रयो लोका एत एव | बृह० १.५.४ |
| तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते | छान्दो० ६.५.३ | त्रयो वेदा एत एव | बृह० १.५.५ |
| तेजो ह वाव उदानः | प्रश्न० ३.९ | त्रयो होद्गीथे | छान्दो० १.८.१ |
| ते तमर्चयन्तस्त्वं | प्रश्न० ६.८ | त्रिणाचिकेत | कठ० १.१.१७ |
| ते देवा अब्रुवन्नेतावद्वा | बृह० १.३.१८ | त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्वि | कठ० १.१.१८ |
| ते ध्यानयोगानुगता | श्वेता० १.३ | त्रिरुन्नतं स्थाप्य | श्वेता० २.८ |
| तेन तꣳह बको | छान्दो० १.२.१३ | त्रिंशत्सार्धाङ्गुलः | अमृ० ३३ |
| तेन तꣳ ह बृहस्पति | छान्दो० १.२.११ | त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति | बृह० १.५.३ |
| तेन तꣳहायास्य | छान्दो० १.२.१२ | त्वावै ग्रहः | बृह० ३.२.९ |
| तेन हवा एवं विदुषा | गाय० ७.१ | त्वङ्मांसशोणिता. | मुद्ग० ४.३ |
| तेनेयं त्रयी विद्या | छान्दो० १.१.९ | त्वं पद महामन्त्रस्य | शु०२० २५ |
| तेनोभौ कुरुतो यश्चैत | छान्दो० १.१.१० | त्वं पदार्थादौपाधि० | सर्व० १४ |
| तेभ्यो ह प्रातेभ्यः | छान्दो० ५.११.५ | त्वं भूर्भुवः स्वस्त्वम् | एका० १३ |
| ते य एवमेतद्विदुर्यं | बृह० ६.२.१५ | त्वमिति तदिति | शु०२० ४१ |
| ते यथा तन्न विवेकम् | छान्दो० ६.९.२ | त्वं मनुष्यवं | मैत्रा० ४.४ (ङ) |
| ते वा एते गुह्या | छान्दो० ३.५.२ | त्वं वज्रभृद्भूत. | एका० ५ |
| ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस | छान्दो० ३.४.२ | त्वं स्त्री त्वं पुमानसि | श्वेता० ४.३ |
| ते वा एते पञ्च | छान्दो० ३.१३.६ | त्वं स्त्री पुमांस्त्वं | एका० ११ |
| ते वा एते रसानाꣳरसा | छान्दो० ३.५.४ | दध्नः सोम्य मध्यमानस्य | छान्दो० ६.६.१ |
| तेषां खल्वेषां भूतानाम् | छान्दो० ६.३.१ | दिवश्चैनमादित्याच्च | बृह० १.५.१९ |
| तेषामसौ विरजो | प्रश्न० १.१६ | दिव्यो ह्यमूर्तः | मुण्ड० २.१.२ |
| ते ह खल्वथोर्ध्वरेतसो | मैत्रा० ४.१ | दुःखमिति......स्वर्गः | निरा० १६ |
| ते ह नासिक्यं | छान्दो० १.२.२ | दुग्धेऽस्मै.....एतदेवम् | छान्दो० २.८.३ |
| ते ह प्राणाः प्रजापतिम् | छान्दो० ५.१.७ | दुग्धेऽस्मै.... एतामेव | छान्दो० १.१३.४ |
| ते ह यथैवेदं | छान्दो० १.१२.४ | दूरमेते विपरीते | कठ० १.२.४ |
| ते ह वाचमूचुस्त्वं न | बृह० १.३.२ | दृप्त बालाकिर्हानूचानो | बृह० २.१.१ |
| ते ह सम्पादयाञ्चक्रुः | छान्दो० ५.११.२ | दृश्यमानस्य सर्वस्य | शु०२० ३८ |
| ते हेमे प्राणा अहꣳश्रेयसे | बृह० ६.१.७ | दृष्टिः स्थिरा यस्य | ना०बि० ५६ |
| ते होचुः क्नु सोऽभूद्यो | बृह० १.३.८ | देवपितृकार्याभ्यां | तैत्ति० १.११.२ |
| ते होचुरुपकोसलेषा | छान्दो० ४.१४.१ | देवमनुष्य.....बन्धः | निरा० २२ |