भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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मन्त्रानुक्रमणिका ५०२ मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण निःशब्दं तत्परम् | नाबि० ४८ | पुरस्ताद् ब्रह्मणस्तस्य | प्रण० १ निष्कलं निष्क्रियं | श्वेता० ६.१९ | पुरा तृतीय सवनस्य | छान्दो० २.२४.११ नीलः पतङ्गो हरितो | श्वेता० ४.४ | पुरा प्रातरनुवाकस्योपा. | छान्दो० २.२४.३ नीहार धूमार्कानिलानलानाम् | श्वेता० २.११ | पुरा माध्यन्दिनस्य | छान्दो० २.२४.७ नैनमूर्ध्वम् | श्वेता० ४.१९ | पुरुष एवेदं विश्वं | मुण्ड० २.१.१० नैव वाचा न | कठ० २.३.१२ | पुरुष एवेदꣳ सर्वम् | श्वेता० ३.१५ नैव स्त्री न पुमानेष | श्वेता० ५.१० | पुरुषसूक्तार्थनिर्णयम् | मुद्ग० १.१ नैवेह किंचनाग्र आसीत् | बृह० १.२.१ | पुरुषः सोम्योत | छान्दो० ६.१६.१ नैवैतेन सुरभि | छान्दो० १.२.९ | पुरुषःसोम्योतोपतापिन्म् | छान्दो० ६.१५.१ नैषा तर्केण | कठ० १.२.९ | पुरुषे ह वा अयमादितो | ऐत० २.१.१ नो इतराणि ये के | तैत्ति० १.११.३ | पुरुषो नारायणो भूतम् | मुद्ग० २.३ नोच्छ्वसेन्न | अमृ० १४ | पुरुषो वा अग्निर्गौतम- | बृह० ६.२.१२ न्यग्रोधफलमत आहरेतीदम् | छान्दो० ६.१२.१ | पुरुषो वाव गौतमाग्निः | छान्दो० ५.७.१ पञ्च पादं पितरं | प्रश्न० १.११ | पुरुषो वाव यज्ञः | छान्दो० ३.१६.१ पञ्च मा राजन्य बन्धुः | छान्दो० ५.३.५ | पूर्णमदः पूर्णमिदम् | बृह० ५.१.१ पञ्चमी नामधेया | ना०बि० १० | पूषन्नेकर्षे यम | ईश० १६ पञ्चम्यामथ मात्रायां | ना०बि० १४ | पृथिवी च पृथिवीमात्रा | प्रश्न० ४.८ पञ्चस्रोतोऽम्बुम् | श्वेता० १.५ | पृथिवी वाव गौतमाग्निः | छान्दो० ५.६.१ पद्मकं स्वस्तिकम् | अपृ० १९ | पृथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षम् | छान्दो० २.१७.१ पद्मसूत्रनिभा | प्रण० १० | पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौः | तैत्ति० १.७.१ परब्रह्मपयोराशौ | शु०२० ५० | पृथिव्यर्चं समदधात् | गाय० ४.३ परमं पदमिति... पदम् | निरा० ३६ | पृथिव्येव यस्यायतन | बृह० ३.९.१० परमात्मेति च ...स सूर्यः | निरा० ७ | पृथिव्यै चैनमग्नेश्च | बृह० १.५.१८ परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते | प्रश्न० ४.१० | पृथ्व्याप्यतेजोऽनिलखे | श्वेता० २.१२ पराचः कामाननुयन्ति | कठ० २.१.२ | प्रकृतिरिति च.....प्रकृतिः | निरा० ६ पराञ्चि खानि | कठ० २.१.१ | प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् | छान्दो० २.२३.२ परिपूर्णः परात्मास्मिन्देहे | शु०२० ३३ | प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषाम् | छान्दो० ४.१७.१ परीक्ष्य लोकान् | मुण्ड० १.२.१२ | प्रजापतिर्वा एषोऽग्रे | मैत्रा० २.६ परोवरीयो हास्य भवति | छान्दो० २.७.२ | प्रजापतिर्विराट् | मन्त्रि० १३ पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम | बृह० ६.२.१० | प्रजापतिश्वरसि | प्रश्न० २.७ पर्जन्यो वाव गौतमाग्नि० | छान्दो० ५.५.१ | प्रणवो धनुः शरो | मुण्ड० २.२.४ पशुषु पञ्चविधं | छान्दो० २.६.१ | प्रतिबोधविदितं | केन० २.४ पश्चाद्व्याययीत | अमृ० २२ | प्रते ब्रवीमि | कठ० १.१.१४ पश्यन्त्यस्यां | मन्त्रि० ८ | प्रत्याहारस्तथा ध्यानम् | अमृ० ६ पादादिकं गुणास्तस्य | ना०बि० २ | प्रथमायां तु मात्रायाम् | ना०बि० १२ पायूपस्थेऽपानं चक्षुः | प्रश्न० ३.५ | प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो | छान्दो० ५.१३.२ पार्थिवः पञ्चमात्रस्तु | अमृ० ३१ | प्रस्तोतर्या देवता | छान्दो० १.१०.९ पिता माता प्रजाैत | बृह० १.५.७ | प्लवा होते अदृढा | मुण्ड० १.२.७ पितृमातृसहोदर...बन्ध | निरा० १९ | प्राचीनशाल औपमन्यवः | छान्दो० ५.११.१ पिबन्त्येनाम | मन्त्रि० ६ | प्राण आद्यो हृदि | अमृ० ३५ पीतोदका जग्धतृणा | कठ० १.१.३ | प्राण इति होवाच | छान्दो० १.११.५ पुरमेकादशद्वारम् | कठ० २.२.१ | प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः | छान्दो० ३.१८.४

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