भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 505 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52

५२ कठोपनिषद (नचिकेता ने कहा) हे यमराज! मेरे पिता गौतम पुत्र उद्दालक, मेरे प्रति शान्त संकल्प वाले, प्रसन्न मन वाले तथा क्रोध रहित हो जाएँ। आपके द्वारा वापस घर भेजे जाने पर मुझे (मेरे पिता) पहचानकर मेरे साथ पूर्ववत् प्रेमपूर्ण व्यवहार करें, (आपके द्वारा प्रदत्त) तीन वरदानों में से यह प्रथम वर माँगता हूँ ॥१०॥ यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । सुखँरात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥ (हे नचिकेता !) आपको मृत्यु के मुख से मुक्त देखकर हमारे द्वारा प्रेरित अरुणपुत्र उद्दालक पूर्ववत् ही पहचान लेंगे। (यह हमारा पुत्र नचिकेता है ऐसा मानते हुए) वे दुःख और क्रोध से रहित होकर शेष रात्रियों में सुखपूर्वक शयन करेंगे ॥ ११ ॥ स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥ नचिकेता बोले- हे मृत्युदेव ! स्वर्ग लोक भयकारक नहीं है। वहाँ मृत्युरूप आपका भी भय नहीं रहता, न वहाँ वृद्धावस्था (संसार की भाँति) डराती है। स्वर्गलोक में मनुष्य भूख-प्यास को पारकर, शोक से निवृत्त होकर आनन्द प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥ स त्वमग्निँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वँश्रद्दधानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥ हे यमराज ! आप स्वर्ग के साधनभूत अग्निविद्या को भली-भाँति जानते हैं। अतः मुझ श्रद्धालु को वह अग्निविद्या भली प्रकार समझाएँ, जिसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त हुए पुरुष अमरत्व को प्राप्त करते हैं। इस अग्नि विद्या को (मैं) द्वितीय वर के रूप में माँगता हूँ ॥ १३ ॥ [ सूत्र है 'श्रद्धया सत्यमाप्यते'-श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है। जैसे आँख से दृश्य तथा कान से शब्द ग्रहण किये जाते हैं, वैसे ही सत्य को श्रद्धा द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है। इसलिए नचिकेता ने अपनी श्रद्धा का हवाला देकर विद्यादान माँगा।] प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतन्निहितं गुहायाम् ॥ १४ ॥ नचिकेता के इस प्रकार कहने पर मृत्युदेव ने कहा - हे नचिकेता ! स्वर्ग प्रदायिनी अग्निविद्या को विधिपूर्वक जानने वाला मैं उसे विस्तारपूर्वक कहता हूँ, तुम उस विद्या को मुझसे भली प्रकार(एकाग्र मन से )समझ लो। अनन्त लोक (स्वर्ग लोक) को प्राप्त कराने वाली, संसार की आधार स्वरूपा इस (अग्नि)विद्या को गुहा में स्थित समझो ॥ १४ ॥ [ गुहा में रखी वस्तु 'गुह्य' अर्थात् बहुत कठिनाई से प्राप्त होने वाली होती है। अन्तःकरण को भी गुहा कहा गया है। स्वर्ग प्रदायिनी अग्नि विद्या के अन्तःकरण में स्थित होने का संकेत यमाचार्य ने किया है। जिस प्रकार काष्ठ में लौकिक अग्नि समाहित रहती है, उसी प्रकार अन्तःकरण में स्वर्ग प्रदायिनी ऊर्जा सन्निहित रहती है।] लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा। स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५ ॥ तदनन्तर यमाचार्य ने लोकों की आदिकारण भूत अग्नि विद्या को नचिकेता के समक्ष कहा। जिस प्रकार की, जितनी इष्टकाओं (ईंटों या इकाइयों) का जिस प्रकार चयन किया जाना है, उसकी सम्पूर्ण

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २) · पृष्ठ 52, कुल 505 में से · BharatKosha