१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ वल्ली २ मन्त्र १२ ५७ धन के व्यामोह से जकड़े हुए विवेकहीन, प्रमादी मनुष्य के अन्तरंग में पारलौकिक विचारधारा का अभ्युदय नहीं होता; क्योंकि वह जीवन के अस्तित्व को प्रत्यक्षवाद पर ही आधारित मानता है । आध्यात्मिक जीवन के अस्तित्व को नकारने वाले शरीराभिमानी मनुष्य, बार-बार जन्म-मरण के बन्धन में घूमता हुआ हमारे (यमराज के) वशीभूत होकर रहता है ॥ ६ ॥ श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः। आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥ जन साधारण को आत्म-तत्त्वज्ञान के संबंध में जानने का सुअवसर तक नहीं मिलता, अगर संयोग से ऐसा अवसर मिला भी, तो अधिकांश ज्ञान-प्रकाश के अभाव में अपने जीवन को तदनुरूप ढालने में सक्षम नहीं होते । उस तत्त्वज्ञान का भली प्रकार प्रतिपादन करने वाले भी अतिदुर्लभ ही हैं । उस ज्ञान को ग्रहण करने वाला भी कोई कुशल जिज्ञासु ही सुपात्र होता है । विशेषज्ञ आचार्य द्वारा तत्त्वज्ञान से अनुप्राणित तत्त्ववेत्ता भी अति दुर्लभ ही होता है ॥ ७ ॥ न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान्ह्यतर्क्यमणूप्रमाणात् ॥ ८ ॥ अनाधिकारी मनुष्य (जिसने इसका भली प्रकार साक्षात्कार नहीं किया) द्वारा कहा गया यह आत्मतत्त्व सहजता से जानने योग्य नहीं। किसी तत्त्ववेत्ता आचार्य द्वारा न समझाये जाने पर भी इस सम्बन्ध में कोई प्रगति नहीं हो पाती। यह विषय बड़ा गूढ़ है, अतएव वह तर्क-वितर्क के दायरे में सीमाबद्ध नहीं है ॥ ८ ॥ नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥ हे प्रिय नचिकेता ! श्रेष्ठ आत्मज्ञान के निमित्त शुष्क तर्क-वितर्क की ऊहापोह से भिन्न आपकी बुद्धि प्रखर है, ऐसी मेधा शक्ति को तर्क द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता । हे नचिकेता ! आप सचमुच ही यथार्थ सत्य के अन्वेषक हैं, (हमारी अन्तरंग इच्छा यही है कि) आप जैसे जिज्ञासु शिष्य ही हमें प्राप्त हों ॥ ९ ॥ जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥ मैं जानता हूँ कि यह कर्मफलजन्य सम्पदा नाशवान् है, नश्वर साधनों के द्वारा उस नित्य (आत्मतत्त्व) को प्राप्त किया जाना शक्य नहीं । मेरे द्वारा नाचिकेत अग्नि का चयन किया गया है । उन्हीं अनित्य पदार्थों अथवा साधनों द्वारा मैंने अभिलषित नित्य आत्मतत्त्व (यम-पद) को प्राप्त किया है ॥ १० ॥ कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम् । स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥ हे नचिकेता ! आपने भोग्य साधनों से भरपूर यज्ञ के चिरस्थायी फल से युक्त, असीम निर्भयता से युक्त, स्तुत्य और प्रशंसनीय प्रतिष्ठा से सम्पन्न स्वर्गलोक को धैर्यपूर्वक छोड़ दिया है। यह आपका अति बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय है ॥ ११ ॥ तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥