भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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६४ कठोपानषद विद्यमान हैं, उसे कोई भी लाँघने में समर्थ नहीं है। यही वह (परमेश्वर) है ॥ ९ ॥ यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥ जो सर्वप्रथम परमेश्वर को इहलोक और परलोक में अलग-अलग रूपों में देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात् उसे बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में फँसना पड़ता है ॥ १० ॥ मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥ सत्य अथवा शुद्ध मन से ही परमात्मा का तत्त्व जाना जा सकता है। इस जगत् में ईश्वर के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है; किन्तु जो व्यक्ति इसमें भिन्नता देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु का वरण करता है ॥ ११ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते, एतद्वै तत् ॥ १२ ॥ जो परम पुरुष अङ्गुष्ठ परिमाण में प्राणी की देह के मध्य भाग में स्थित है, वह भूत, भविष्यत् और वर्तमान का शासक है। उसे इस प्रकार जान लेने के बाद प्राणी न तो किसी की निन्दा करता है और न ही किसी से घृणा करता है। यही वह ब्रह्म है ॥ १२ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः, एतद्वै तत् ॥ १३ ॥ वह अङ्गुष्ठ परिमाण वाला परमात्मा धुएँ से रहित प्रखर ज्योति के समान है, जो सब पर शासन करता है। वह (नित्य सनातन) ब्रह्म जैसा कल था, वैसा ही आज भी (अपरिवर्तनीय) है। यही वह परब्रह्म है ॥ १३ ॥ यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान्पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥ जिस प्रकार वर्षा का जल ऊँचे शिखरों पर बरस कर पहाड़ के नीचे विभिन्न स्थलों में चला जाता है, उसी प्रकार विभिन्न धर्म-सम्प्रदाय वालों (अथवा विभिन्न स्वभाव वाले मनुष्यों-असुरों और देवों) को जो परमेश्वर से भिन्न देखता है, वह उन्हीं का अनुगमन करता है (अर्थात् उस बिखरे जल की तरह विभिन्न देव-असुर आदि के लोकों व योनियों में भटकता रहता है) ॥ १४ ॥ यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥ हे गौतम (नचिकेता) ! जिस प्रकार शुद्ध जल सिंचित होने पर (जहाँ जाता है ) उसी रूप में बदल जाता है, इसी प्रकार ज्ञानी (इस तथ्य को समझ लेने वाले) की आत्मा भी उसी प्रकार हो जाती है ॥ १५ ॥ [ यमदेव शुद्ध जल के उदाहरण से आत्म तत्त्व को समझा रहे हैं। शुद्ध जल जिस किसी पात्र में जाता है, उसी रूप में ढल जाता है । पौधों में वह उनका रस, प्राणियों में उनका रक्त बन जाता है , उसे कोई विकार नहीं होता। ज्ञानी अपनी चेतना को पदार्थ आदि भोगों से अलिप्त रखता है, इसलिए वह शुद्ध जल की तरह किसी के भी साथ एकाकार हो सकता है। विभिन्न विषयों से लेकर देवशक्तियों तथा परमात्म तत्त्व के साथ वह एकरूप हो सकता है। नचिकेता उसी अलिप्त रहने की क्षमता से सम्पन्न साधक को कहा जाता है। उसको सत्पात्र समझ कर ही यमदेव यह विद्या उपलब्ध कराते हैं।]