भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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९४ ] [ द्वितीय अध्याय पद्मकोशप्रतीकाशं लम्बत्याकोशसंनिभम् । हृदयं चाप्यधोमुखं संतस्तै सीत्काराभिश्च ॥१२ तस्ये मध्यं महानर्चिर्विश्वार्चिर्विश्वतोमुखम् । तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ॥१३ तस्याः शिखाया मध्ये पुरुषः परमात्मा व्यवस्थितः । स ब्रह्मा स ईशानः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥ इति महोपनिषत् ॥१४॥ जो भले प्रकार से पद्मकोश के समान लम्बायमान एवं अधोमुख हृदय है, उससे सीत्कार शब्द निकलता रहता है । उस हृदय के मध्य में ही एक ज्वाला प्रदीप्त है । वही ज्वाला दीपशिखा के समान दसों दिशाओं में प्रकाश को बाँटकर विश्व को प्रकाशित करती है । उसी ज्वाला के मध्य में कुछ ऊपर उठी हुई एक क्षीण वह्निशिखा है । उसी शिखा में परमात्मा निवास करते हैं । वही परमात्मा ब्रह्मा, ईशान, इन्द्र हैं तथा वे अविनाशी एवम् परम स्वराट् हैं ॥ १२-१४ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ द्वितीयोऽध्यायः शुको नाम महातेजाः स्वरूपानन्दतत्परः । जातमात्रेण मुनिराड् यत् सत्यं तदवाप्तवान् ॥१ तेनासौ स्वविवेकेन स्वयमेव महामनाः । प्रविचार्य चिरं साधु स्वात्मनिश्चयमाप्नुयात् ॥२ अनाख्यत्वादगम्यत्वान्मनः षष्ठेन्द्रियस्थितेः । चिन्मात्र मेवायमणुराकाशादपि सूक्ष्मकः ॥३ चिदणोः परमस्यान्तः कोटिब्रह्माण्डरेणवः । उत्पत्तिस्थितिमभ्येत्य लीयन्ते शक्तिपर्ययात् ॥४