१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमहोपनिषत् ११३ दासाः पुत्राः स्त्रियश्चैव बान्धवाः सुहृदस्तथा । हसत्युन्मत्तकमिव नरं वार्धककम्पितम् ॥३५ दैन्यदोषमयी दीर्घा वर्धते वार्धके स्पृहा । सर्वापदामेकसखी हृदि दाहप्रदायिनी ॥३६ कच्चिद्वा विद्यते यैषा संसारे सुखभावना । आखुः स्तम्बमिवासाद्य कालस्तामपि कृन्तति ॥३७ तृणं पांसुं महेन्द्रं च सुवर्णं मेरुसर्षपम् । आत्मंभरितया सर्वमात्मसात्कर्तुमुद्यतः । कालोऽयं सर्वसंहारी तेनाक्रान्तं जगत्त्रयम् ॥३८ ऐसा य देह रूप गृह मुझे अच्छा नहीं लगता । हे पिताजी ! यह देह बाहर से तथा भीतर से भी मांस और रक्त से ही व्याप्त है तो इस नाशवान् देह में सुन्दरता कहाँ से आई ? यदि कोई यह विश्वास करता हो कि विद्युत में चपलता अथवा गंधर्वों की नगरी में चंचलता नहीं है तो वह इस देह के स्थिर होने में भले ही सन्देह न करे । इस देह की तीनों अवस्थायें भय के देने वाली हैं । बालकपन में अपने से बड़े लड़कों से तथा माता-पिता आदि से भय लगता है । युवावस्था प्राप्त होने पर अपने ही चित्त के भीतर निवास करने वाले कामरूपी पिशाश के भ्रम जाल में फँसकर पराजय को प्राप्त करता है । वृद्धावस्था प्राप्त होने पर मनुष्य कांपता हुआ चलता-फिरता है । उसे देखकर स्त्रियाँ बन्धु, मित्र, पुत्र, पुत्रियाँ तथा नौकर-चाकर भी हँसी उड़ाते हैं । उस आयु में सामर्थ्यहीनता के कारण कामनाओं की अधिक वृद्धि होती है । यह जरावस्था हृदय को जलाने वाली सब विपत्तियों की सखी है । जिस सुख की भावना सांसारिक प्राणी करता है, वह सुख है कहाँ ? काल तो तिनके के समान काटता ही जाता है । वह काल छोटे से तिनके और रज के कणों को भी महेन्द्र तथा मेरु पर्वत को भी सरसों के समान कर देने में समर्थं है । यह सभी को नष्ट करने वाला है और अपना पेट