भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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महोपनिषत् [ ११६ यह चित् के स्पन्दन का एक अंश रूप ही है। इसलिए चित्त ही सब कुछ है। तुम सांसारिक कार्यों को करते हुये भी नित्य प्रबुद्ध चित्त से आत्मा के एकीभाव का ज्ञान प्राप्त कर प्रशान्त रहने वाले महान् सागर के समान निश्चल एवं दृढ़चित्त रहो। ऐसा करने से ही कल्याण सम्भव है ॥ १—११ ॥ तत्त्वावबोध एवासौ वासनातृणपावकः । प्रोक्तः समाधिशब्देन न तु तूष्णीमवस्थितिः ॥१२ निरिच्छे संस्थिते रत्ने यथा लोकः प्रवर्तते । सत्तामात्रे परे तत्त्वे तथैवायं जगद्गणः ॥१३ अतश्चात्मनि कर्तृत्वमकर्तृत्वं च वै मुने । निरिच्छत्वादकर्त्ताऽसौ कर्ता संनिधिमात्रतः ॥१४ ते द्वे ब्रह्मणि विन्देते कर्तृ ताकर्तृ ते । यन्नैवैष चमत्कारस्तमाश्रित्य स्थिरो भव ॥१५ तस्मान्नित्यमकर्ताऽहमिति भावनयेद्धया । परमामृतनाम्नी सा समतैवावशिष्यते ॥१६ निदाघ शृणु सत्त्वस्था जाता भुवि महागुणाः । ते नित्यमेवाभ्युदिताः मुदिताः ख इवेन्दवः ॥१७ यह आत्मज्ञान वासना रूप तिनके को जलाने वाले अग्नि के समान है। इसी को समाधि कहा गया है। केवल मौन रहना ही समाधि नहीं है। जैसे रत्न बिना किसी कामना के यों ही पड़ा रहता है तो भी उसे देखने वाले व्यक्ति उसकी ओर आकर्षित होते ही हैं, वैसे ही सत्तामात्र जो परतत्व है उसकी ओर सम्पूर्ण विश्व आकर्षित होता है। इसी आत्मा में कर्तृत्व और अकर्तृत्व दोनों ही विद्यमान हैं। कामना रहित रहने पर आत्मा 'अकर्ता है और सन्निधिमात्र से कर्ता बन जाता है। ब्रह्म में कर्तृत्व ओर अकृतृत्व दोनों की ही उपलब्धि है, तुम्हें जिसमें ऐसा चमत्कार दिखाई दे, उसी का आश्रय पकड़ लो। 'मैं सदा Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi