भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 129

महोपनिषत् [ १२१ गुरुवाक्यसमुद्भूतस्वानुभूत्याऽतिशुद्धया । यस्याभ्यासेन तेनात्मा सततं चावलोक्यते ॥२६ विनष्टदिग्भ्रमस्यापि यथापूर्वं विभाति दिक् । तथा विज्ञानविध्वस्तं जगन्नास्तीति भावय ॥२७ न धनान्युपकुर्वन्ति न मित्राणि न बान्धवाः । न कायक्लेशवैधुर्यं न तीर्थायतनाश्रयः । केवलं तन्मनोमात्रजये नासाद्यते पदम् ॥२८ सत्व में स्थित पुरुष स्वर्णिम कमल के समान रात्रि रूप विपत्ति में कुण्ठित नहीं होते । जो भोग सहज उपलब्ध हो जांय उनके सिवा अन्य वस्तु की इच्छा नहीं करते और शास्त्र के अनुकूल चलते हैं, वे सहज ही मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा आदि गुणों से विभूषित रहते हैं । वे सदा समान भाव में स्थित रहकर लगातार साधुवृत्ति में ही रहे आते हैं । वे लोक मर्यादा से परे रहकर समुद्र के समान विशाल हृदय वाले होकर सूर्य के समान नियत मार्ग पर ही गमन करते हैं । विचार करना हो तो स्वयं क्या है, विश्व प्रपंच कैसे उत्पन्न हुआ है, इस पर बुद्धिपूर्वक विचार करे । वह कभी निरर्थक कार्य को न करे और दुष्ट के संग से बचता रहे । मृत्यु सब को खा जाती है, उसके प्रति उपेक्षा-भाव न रखे । यदि उपेक्षा करनी है तो देह, अस्थि, मांस, रक्त आदि नश्वर पदार्थों के प्रति उपेक्षा करे । जैसे मोती की लड़ियों में सूत्र पिरोया जाता है, वैसे प्राणियों में पिरोये हुये चिदात्मा को देखे । देय वस्तु को त्यागे और उपादेय को ग्रहण करे । यह जान लो कि मन का स्वरूप बाहरी है, भीतरी नहीं । गुरु और शास्त्र के वचन तथा अपने अनुभव से "मैं ब्रह्म हूँ" ऐसा जान ले और शोकादि का त्याग करे । ऐसी अवस्था में तीक्ष्ण तलवार के सैकड़ों आघात कमल की कोमल मार के समान सहन करने योग्य हो जाते हैं । अग्नि के द्वारा जलाये जाने का प्रभाव शीतल जल में स्नान करने के समान सहनीय हो