भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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महोपनिषद् [०. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ १३५ तावत् संसारभृगुषु स्वात्मना सह देहिनम् । आन्दोलयति नीरन्ध्रदुःखकण्टकथालिषु ॥१११ अविद्या यावदस्यास्तु नोत्पन्ना क्षयकारिणी । स्वयमात्मावलोकेच्छा मोहसं क्षयकारिणी ॥११२ अस्याः परं प्रपश्यन्त्याः रुवात्मनाशः प्रजायते । दृष्टे सर्वगते बोधे स्वयं ह्येषा विलीयते ॥११३ इच्छामात्रमविद्येयं तन्नाशो मोक्ष उच्यते । स चांसंकल्पमात्रेण सिद्धो भवति वै मुने ॥११४ हे मुने ! जिस उद्देश्य में [अपने मन को लगाओ उसे प्राप्त करने के लिए निर्विकल्प समाधि को पावो । चित्त को चित्त से वशीभूत करो और शोक रहित रहते हुए आतंक से दूर रहकर शान्ति प्राप्त करो । विषयों से रहित मन ही मन का पूर्ण विरोध कर सकता है । जो राजा राज्य पर आसीन है, वही किसी राजा को पराजित करने में सफलता प्राप्त करता है । जो तृष्णारूपी [ग्राह द्वारा ग्रहण किए हुए हैं, जो संसार सागर में गिरकर किनारे पर आने से असमर्थ हो चुके हैं तथा भँवर जाल में पड़ गये हैं, उनकी रक्षा के कार्य में विषय-विकारों से शून्य मन ही समर्थ है । वही नौका रूप होकर उन्हें पार लगा सकता है । हे मुने ! ऐसे अत्यन्त सामर्थ्य वाले मन के द्वारा इस घोर बन्धन रूप मान- सिक पाश को खण्ड-खण्ड कर डालो और स्वयं ही इस संसार समुद्र से पार हो जाओ क्योंकि दूसरा कोई इस समुद्र से पार नहीं कर सकता । जब जब अन्तःकरण को अच्छादित करने वाली मन रूपी वासना का प्रादुर्भाव हो, तब तब उसका त्याग करना बुद्धिमान पुरुष का कर्त्तव्य है। ऐसा करने से अविद्या रूप अन्धकार नष्ट हो जाता है। प्रथम भोग रूप वासना त्यागनी चाहिए, फिर भेद रूप वासना और उसके पश्चात् भाव अभाव दोनों का ही त्याग कर देना उचित है, इससे हे पुत्र ! तुम विकल्प रहित और सुखी होओ । मन का नाश ही अविद्या का Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi