भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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१४६ ] पंचम अध्याय ये तु मोहार्णवात्तीर्णास्तैः प्राप्तं परमं पदम् ॥४१॥ ते स्थिता भूमिकास्वासु स्वात्मलाभपरायणाः । मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते ॥४२॥ सप्तभूमिः स विज्ञेयः कथितास्तश्च भूमिकाः । एतासां भूमिकानां तु गम्यं ब्रम्हाभिधं पदम् ॥४३॥ त्वत्ताऽहन्ताऽऽत्मता यत्र परता नास्ति काचन । न क्वचिद्भावकलना न भावाभावगोचरा ॥४४। सर्वं सान्तं निरालम्ब व्योमस्थं शावश्वतं शिवम् । अनामयमनाभासमनामकमकारणम् ॥४५॥ न सन्नासन्न मध्यं तन्न सर्वं सर्वमेव च । मनोवचोभिरग्राह्यं पूर्णात् पूर्णं सुखात् सुखम् । असंवेदनमाशान्तमात्मवेदनमाततम् । सत्ता सर्वपदार्थानां नान्या संवेदनादृते ॥४७॥ परम पद उन्हीं को मिलता है जो मोह रूप समुद्र से पार हो चुके हैं । जैसे मृगतृष्णा में जल का भ्रम उत्पन्न होता है वैसे ही अनात्म में आत्म बुद्ध का प्रादुर्भाव होता है, इसी को अविद्या कहा गया है और अविद्या नष्ट होना ही मुक्ति है । इन भूमिकाओं में वे पुरुष ही स्थित होते हैं जो आत्म साक्षात्कार के प्रयत्न में लगे हैं ! मन की पूर्ण शान्ति के उपाय को योग कहा है । योग की सातों भूमिकाओं का वर्णन किया जा चुका है । इन भूमिकाओं का उद्देश्य ब्रह्मपद की प्राप्ति है । ब्रह्मपद वह है जिसमें मेरा-तेरा रूप अपने पराये का भेद-भाव नहीं होता । उस समय भगवान का न तो चिन्तन होता है और न भावात्मक बुद्धि ही शेष रहती है क्योंकि सांसारिक पदार्थों का अस्तित्व आत्म-संवेदन मात्र है, इससे भिन्न कुछ नहीं । आकाशस्वरूप शिव, शाश्वत, दोष-शून्य, आलम्बन-शून्य, कारण-रहित, अनिर्वचनीय, सत्-असत् से रहित, मध्य-अन्त से रहित, सम्पूर्ण और सम्पूर्ण भी,

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