१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५८ ] [महोपनिषत् ईदृशी भूतसायेयं या स्वनाशेन हर्षदा ॥१११ न लक्ष्यते स्वभावोऽस्या वीक्ष्यमाणैव नश्यति । नास्त्येषा परमार्थेनेत्येवं भावनयेद्धया ॥११२ सर्वं ब्रह्मेति यस्यान्तर्भाविना सा हि मुक्तिदा । भेदद्रष्टिरविद्येयं सर्वथा तां विसर्जयेत् ॥११३ श्रेष्ठ अविद्या स्वार्थ को नष्ट करने के लिये ही उद्यत है, उसी के द्वारा सर्वदोषनाशिनी विद्या प्राप्त होती है । अस्त्र ही अस्त्र को काटता है और मल से ही मल घुलता है । विष ही विष को नष्ट करने वाला है, शत्रु ही शत्रु का संहार करता है । इसी प्रकार यह भूत माया अपने ही नाश द्वारा प्रसन्न होती है । इसका स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं होता । जब यह दिखाई देती है, तभी नाश को प्राप्त होती है । परन्तु इसे माया न मानकर सब कुछ ब्रह्म मानना ही मोक्ष प्राप्ति का साधन है । भेद का दिखाई देना ही अविद्या है, इसलिए भेद-दृष्टि का त्याग करना ही श्रेयस्कर है ॥१०८-११३॥ मुने नासाद्यते तद्धि पदमक्षयमुच्यते । कुतो जातेयमिति ते द्विज माऽस्तु विचारणा ॥११४ इमां कथ महं हन्मीत्येषा तेऽस्तु विचारणा । अस्तं गतायां क्षीणायामस्यां ज्ञास्यसि तत् पदम् ॥११५ यत एषा यथा चैषा यथा नष्टेत्यखण्डितम् । तदस्या रोगशालाया तत्नं कुरु चिकित्सने ॥११६ यथैषा जन्मदुःखेषु न भूयस्त्वां नियोक्ष्यति । स्वात्मनि स्वपरिस्पन्दैः स्फुरत्यच्छेश्चिदर्णवः ॥११७ एकात्मकमखण्डं तदित्यन्तर्भाव्यतां दृढम् । किंचित्क्षुभितरूपा सा चिच्छक्तिश्चिन्महार्णवे ॥११८ तन्मयैव स्फुरत्यच्छा तत्रैवोर्मिरिवार्णवे । आत्मन्येवात्मना ऽम्भोरित्न यथा सरति मारुतः ॥११९॥