१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 171, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri महोपनिषत् ] [ १६३ अथेत्थंभूततन्मात्रवेष्टितं तनुतां जहत् । वपुर्वृत्तिकणाकारं स्फुरितं व्योम्नि पश्यति ॥१५२ अहंकारकलायुक्तं बुद्धिबीजसमन्वितम् । तत्पुर्यष्टकमित्युक्तं भूतहृत्पद्मषट्पदम् ॥१५३ तस्मिंस्तु तीव्रसंवेगाद्भावयद् भासुरं वपुः स्थूलतामेति पाकेन मनो विल्वफलं यथा ॥१५४ मूषास्थद्रुतहेमाभं स्फुरितं विमलाम्बरे । संनिवेशमथादत्ते तत्तजः स्वस्वभावतः ॥१५५ ऊर्ध्वं शिरः पिण्डमयमधः पादमयं तथा । पार्श्वयोर्हस्तसंस्थानं मध्ये चोदरधर्मिणम् ॥१५६ कालेन स्फुटतामेत्य भवत्यमलविग्रहम् । बुद्धिसत्त्वबलोत्साहविज्ञानैश्वर्यस्थितः । स एव भगवान् ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥१५७ हे ब्रह्मन् ! जैसे हाथी कीचड़ में फँस जाता है, वैसे ही यह मन चिन्तारूपी अग्नि की ज्वाला से जलाया हुआ, क्रोधरूप अजगर द्वारा काटा हुआ और कामरूपी समुद्र के भंवर जाल में पड़ा हुआ है । यह अपने पितामह आत्मा को भी भूल गया है इसलिये इसी का सर्वप्रथम उद्धार करो । जीव के आश्रित हुये अनेक भाव लाखों, करोड़ों भेदों में ब्रह्म के द्वारा कल्पित होकर उत्पन्न हुए और हो रहे हैं। जैसे निर्झर में जल-कणों की उत्पत्ति होती है वैसे ही यह भविष्य में भी होते रहेंगे । कुछ भाव तो सैकड़ों बार उत्पन्न हो चुके हैं, कुछ असंख्य बार उत्पन्न हुये हैं, कोई दो-तीन बार ही उत्पन्न हुये और कुछ तो ऐसे हैं जो प्रथम बार ही जन्म ग्रहण कर रहे हैं । इन सबने विभिन्न नामरूप धारण किये हैं । कोई सूर्य, चन्द्रमा, हरि, शिव, वरुण, ब्रह्मा आदि के रूप में हैं तो कोई किन्नर, यक्ष, गन्धर्व और नाग रूप में प्रकट हुये हैं ।