भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187

महोपनिषद् ] [ १७६ आपादमस्तकमहं मातापितृविनिर्मितः । इत्येको निश्चयो ब्रह्मन् बन्धायासवलोकनात् ॥५५ अतीतं सर्वभावेभ्यो वालाग्रादप्यहं तनुः । इति द्वितीयो मोक्षाय निश्चयो जायते सताम् ॥५६ जगज्जालपदार्थात्मा सर्व एवाहमक्षयः । तृतीयो निश्चयश्चोक्तो मोक्षायैव द्विजोत्तम् ॥५७ अहं जगद्वा सकलं शून्यं व्योम समं सदा । एवमेष चतुर्थोऽपि निश्चयो मोक्षसिद्धिदः ॥५८ एतेषां प्रथमः प्रोक्तस्तृष्णया बन्धयोग्यया । शुद्धतृष्णास्त्रयः स्वच्छा जीवन्मुक्ता विलासिनः ॥५९ सर्वं चाप्यहमेवेति निश्चयो यो महामते । तमादाय विषादाय न भूयो जायते मतिः ॥६० हे श्रेष्ठ आत्मन् ! मनुष्य चार प्रकार के निश्चय वाला है । ‘मेरे देह की रचना माता-पिता द्वारा हुई है’ यह प्रथम निश्चय मानना चाहिए । ‘मैं जगदात्मक भावों से रहित केशाग्र से भी सूक्ष्माकार आत्मा हूँ’ यह दूसरे प्रकार का निश्चय है । इस निश्चय के द्वारा सन्तजनों को मुक्ति प्राप्त होती है । ‘मैं अखिल विश्व के पदार्थों का आत्मा सर्वस्वरूप एवम् अविनाशी हूँ’ यह तीसरे प्रकार का निश्चय भी मुक्ति का कारण होता है । ‘मैं और यह सम्पूर्ण विश्व आकाश के समान शून्य हैं’ यह चौथे प्रकार का निश्चय मोक्ष-सिद्धि का दाता है । इनमें प्रथम निश्चय बन्धन प्रदान करने वाली तृष्णा से ओत-प्रोत है । शेष तीन प्रकार के निश्चय पवित्र तृष्णा वाले हैं । जो लोग इन तीन प्रकार के निश्चयों से युक्त होते हैं वे आत्मतत्व में रत रहने वाले जीवन्मुक्त हैं । सब कुछ अपने को ही मानने वाले पुरुष फिर-फिर कर विषाद में नहीं पड़ते हैं ॥ ५४-६० ॥ शून्यं तत् प्रकृतिर्माया ब्रह्म विज्ञानमित्यपि । शिवः पूरुष ईशानो नित्यमात्मेति कथ्यते ॥६१