भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १६३ देहेन्द्रियेषु वैराग्यं यम इत्युच्यते बुधैः ॥२८ अनुरक्तिः परे तत्त्वे सततं नियमः स्मृतः । सर्ववस्तुषूदासीनभाव आसनमुत्तमम् ॥२९ जगत्सर्वमिदं मिथ्याप्रतीतिः प्राणसंयमः । चित्तस्यान्तर्मुखीभावः प्रत्याहारस्तु सत्तम ॥३० इसी प्रकार संयोग भी दो प्रकार के होते हैं। शास्त्रानुकूल कर्मों में सदैव मन का निग्रह करते रहना कर्मयोग कहलाता है । चित्त को निरन्तर आत्म-कल्याण में संलग्न रखना ज्ञानयोग है। इससे सब प्रकार की आत्मा सम्बन्धी सिद्धियां प्राप्त होती हैं। इस प्रकार दोनों तरह के योगों का जो निर्विकार भाव से करता है वह बिना बिलम्ब मोक्ष रूपी परम श्रेय को प्राप्त कर लेता है। देह और इन्द्रियों के प्रति सब प्रकार से वैराग्य भावना यम कहलाता है ॥२५--२८॥ और परम तत्व से सदा अनुराग रखना नियम कहा गया है। सब वस्तुओं में उदासीन वृत्ति ही सर्वोत्तम आसन है ॥ २९ ॥ जगत के मिथ्या स्वरूप को भली प्रकार समझ लेना प्राणायाम है। चित्त की अन्तर्मुखी वृत्ति ही प्रत्याहार है ॥ ३० ॥ चित्तस्य निश्चलीभावो धारणा धारणं विदुः । सोऽहं चिन्मात्रमेवेति चिन्तनं ध्यानमुच्यते ॥३१ ध्यानस्य विस्मृतिः सम्यक्समाधिरभिधीयते । अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्य्यँद्दताऽऽर्जवम् ॥३२ क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश । तपस्सन्तुष्टिरास्तिक्यं दानमाराधनं हरेः ॥३३ वेदान्तश्रवणञ्चैव ह्रीर्मतिश्च जपो व्रतम् ।