१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १६६ स्फुरिता हृदयाकाशे नागरूपा महोज्ज्वला ॥६४ अपानाद्द्व्यङ्गुलादूर्ध्वमधो मेद्रस्य तावता । देहमध्यं मनुष्याणां हृन्मध्यं तु चतुष्पदाम् ॥६५ जीव प्राण पर आरूढ़ होकर ही भ्रमण करता है, उसके बिना नहीं कर सकता। उसके ऊपर कुण्डलिनी का तिरछा और ऊंचा स्थान है ॥६१॥ वह अष्ट प्रकृतिरूपा आठ प्रकार की कुण्डली करके कन्द को घेरे हुए है और वायु तथा अन्न-जल के सञ्चार को रोकती रहती है। उसने ब्रह्मरन्ध्र के मुख को अपने मुख से ढका हुआ है ॥६२- ॥६३॥ योगाभ्यास द्वारा यह कुण्डलिनी शक्ति पवन द्वारा जागृत अग्नि के समान हृदयाकाश में नाग रूप से अत्यन्त उज्ज्वल स्फुरित होती है ॥६४॥ अपान से दो अँगुल ऊपर और मेढ़ से नीचे, मानव-देह का मध्य भाग माना जाता है। चौपायों का मध्य भाग उनके हृदय- स्थान में होता है ॥६५॥ इतरेषां तुन्द मध्यं नानानाड़ीसमावृतम् । चतुष्प्रकारद्रव्ययुते देहमध्ये सुषुम्नया ॥६६ कन्दमध्ये स्थिता नाडी सुषुम्ना सुप्रतिष्ठिता । पद्मसूत्रप्रतीकाशा ऋजुरूर्ध्वप्रवर्तिनी ॥६७ ब्रह्मणो विवरं यावद्विद्युदाभासनालकम् । वैष्णवी ब्रह्मनाडी च निर्वाणप्रप्तिपद्धतिः ॥६८ इडा च पिङ्गला चैव तस्याः सव्येतरे स्थिते । इडा समुत्थिता कन्दान्द्वामनासापुटावधिः ॥६९ पिङ्गला चोत्थिता तस्माद्दक्षनासापुटाविधिः । गन्धारी हस्तिजिह्वा च द्वे चान्ये नाडिके स्थिते ॥७० पुरतः पृष्ठतस्तस्याः वामेतरदृशौ प्रति । पूषायशस्विनौनाड्यौ तस्मादेव समुत्थिते ॥७१