१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०१ प्राण एवाथवा ज्येष्ठो जीवात्मानं विभर्ति यः । आस्यनासिकयोर्मध्यं हृदयं नाभिमण्डलम् ॥७८ पादांगुष्ठमिति प्राणस्थानानि द्विजसत्तम । अपानश्चरति ब्रह्मन् गुदमेढ्रोरुजानुषु ॥७९ समानः सर्वगात्रेषु सर्वव्यापी व्यवस्थितः । उदानः सर्वसन्धिस्थः पादयोर्हस्तयोरपि ॥८० कन्द से पैर के अंगूठे तक कौशिकी नाम वाली नाड़ी गई है । इस प्रकार ये दस नाड़ियाँ कन्द से निकली हुई कही गई हैं ॥ ७३ ॥ उनसे निकलने वाली अन्य बहुत सी स्थूल और सूक्ष्म नाड़ियाँ हैं, जिनकी संख्या सब मिलाकर बहत्तर हजार कही गई है ॥ ७४ ॥ इन स्थूल और सूक्ष्म नाड़ियों की गिनती कर सकना कठिन है, वे उसी प्रकार फैली हुई हैं जिस प्रकार पीपल के पत्ते में नसें फैली होती हैं ॥ ७५ ॥ प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनञ्जय—ये दश वायु भी नाड़ियों में चलते रहते हैं । इनमें प्राण आदि प्रथम पाँच मुख्य हैं, अथवा दो (प्राण और अपान) मुख्य हैं अथवा प्राणवायु ही सबसे मुख्य है जो जीव को धारण किये रहता है । हे द्विज श्रेष्ठ ! प्राण के मुख्य स्थान पाँच हैं-मुख नासिका का मध्य भाग, हृदय, नाभि-मण्डल और पैर का अँगूठा अपान, गुदा, मेढ्र, जङ्घा, और घुटने में चलता है । समान वायु सब अङ्गों में व्याप्त रहता है और उदान चारों हाथ पैरों और सब संधि स्थानों में स्थित है ॥७६-८०॥ व्यानः श्रोत्रोरुकट्यां च गुल्फस्कन्धगलेषु च । नागादिवायवः पञ्च त्वगस्थ्यादिषु संस्थिताः ॥८१ तुन्दस्थं जलमन्नं च रसादि च समीकृतम् । तुन्दमध्यगतः प्राणस्तानि कुर्यात्पृथक्पृथक् ॥८२