१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 211, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०३ ] तावदासनमुत्सेधे तावद्द्वयसमायते । उपविश्यासनं सम्यक्स्वस्तिकादि यथारुचि ॥६० भूख लगना कृकर का, निद्रा आदि देवदत्त का और मृत शरीर की शोभा आदि धनञ्जय वायु का कार्य है ॥ ८६ ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मण ! नाड़ी, वायु, प्राणों के स्थान और चेष्टाएँ विविध प्रकार की हैं, उनको जानना चाहिये ॥ ८७ ॥ जब पूर्वोक्त विधि से नाड़ियों को शुद्ध कर ले तब सब प्रकार के सम्बन्धों को त्याग कर एकान्त स्थान में, सब प्रकार की योग-साधन में आवश्यक सामग्री लेकर लकड़ी की बनी कुटी में दर्भ, कुशा और मृग चर्म का आसन प्रस्तुत करे ॥ ८८--८९ ॥ जब तक दोनों तरफ के अङ्ग समान न हो जांय तब तक आसन-साधन करता रहे । इसके लिए आसन स्थान पर बैठकर अपनी रुचि के अनुसार स्वास्तिक आदि कोई-सा भी आसन लगाता रहे ॥ ९० ॥ बद्ध्वा प्रागासनं विप्र ऋजुकायः समाहितः । नासाग्रन्यस्तनयनो दन्तैर्दन्तानस्पृशन् ॥९१ रसनां तालुनि न्यस्य स्वस्थचित्तो निरामयः । आकुञ्चितशिरः किञ्चिन्निबध्नन्योगमुद्रया ॥९२ हस्तौ यथोक्तविधिना प्राणायामं समाचरेत् । रेचनं पूरणं वायो शोधनं रेचनं तथा ॥९३ चतुर्भिः क्लेशनं वायोः प्राणायाम उदीर्यते । हस्तेन दक्षिणेनैव पीडयेन्नासिकापुटम् ॥९४ शनैः शनैरथ बहिः प्रक्षिपेत्पिङ्ग़लानिलम् । इडया वायुमापूर्य ब्रह्मान्धोशमानया ॥६५ पूरितं कुम्भयेत्तस्माच्चतुःषष्ट्या तु मात्रया ।