भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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२०८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् हो जाता है और नासिका से क्रमपूर्वक आता जाता रहता है ॥ ११६ ॥ तीन नाड़ियाँ हैं। प्राणायाम करने वाले योगियों का श्वास दांये और बाँये नासापुट के समान समय तक चलता रहता है। इस प्रकार जिसका प्राणवायु क्रम से चलता है, वह प्राणजित हो जाता है। फिर वह दिन, रात्रि, पक्ष, मास, अयन आदि के काल-भेद को अन्तर्मुख होकर जानने लगता है ॥ ११७--११९ ॥ अँगूठा आदि अपने अवयवों में स्फुरण ( नदियों का रक्त गति से फड़कना ) बन्द हो जाने पर शीघ्र ही अपने जीवन का अन्त होना समझ लेना चाहिये ॥ १२० ॥ ज्ञात्वा यतेत कैवल्यप्राप्तये योगवित्तमः । पादांगुष्ठे करांगुष्ठे स्फुरणं यस्य नश्यति ॥१२१ तस्य संवत्सरादूर्ध्वं जीवितव्यक्षयो भवेत् । मणिबन्धे तथा गुल्फे स्फुरणं यस्य नश्यति ॥१२२ षष्मासावधिरेतस्य जीवितस्य स्थितिर्भवेत् । कूर्परास्फुरणं यस्य तस्य त्रैमासिकी स्थितिः ॥१२३ कक्षे मेहनपार्श्वे च स्फुरणानुपलम्भने । मासावधिजीवितं स्यात् तदर्धं सत्वदर्शने ॥१२४ आश्रिते जठरे द्वारे दिनानि दश जीवितम् । ज्योतिः खद्योतवद्यस्थ तदर्धं तस्य जीवितम् ॥१२५ इस प्रकार अनिष्ट सूचक संकेतों को जानकर योगी को मोक्ष-साधन में ध्यान लगाना चाहिए। जिसके पैर तथा हाथ के अँगूठों में स्फुरण न जान पड़े। उसका जीवन एक वर्ष में समाप्त हो जाता है। मणिबन्ध (कलाई) और गुल्फ (टखना) का स्फुरण बन्द हो जाने पर छः महीने तक जीवित रहता है। जब कोहनी में स्फुरण न हो तो जीवन की अवधि तीन मास रह जाती है