भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २१३ कुम्भक करते हुए जो भगवान वासुदेव का ध्यान करता है, उसके सात जन्म के पाप विनष्ट हो जाते हैं। नाभिकन्द से लेकर हृदय-प्रदेश तक जाग्रत वृत्ति का स्थान है, स्वप्न वृत्ति कण्ठ में रहती है, सुषुप्ति तालु के मध्य में और तुरीय भ्रुकुटियों के मध्य में स्थित है ॥ १४७-१४६ ॥ तुर्यातीत का स्थान ब्रह्मरन्ध्र में परब्रह्म की ओर होता है। जागृत वृत्ति से लगाकर ब्रह्मरन्ध्र तक तुरीय का आत्मा रहता है। उसके पश्चात् वह विष्णु कहलाता है। तब साधक अत्यन्त निर्मल आकाश में हृदय-कमल पर आसीन करोड़ों सूर्यं के समान प्रभा वाले नित्य उदयरूपी विश्वरूप विष्णु का ध्यान करे ॥ १५०--१५२ ॥ अनेकाकारखचितमनेकवदनान्वितम् । अनेकभुजसंयुक्तमनेकायुधमण्डितम् ॥१५३ नानावर्णधरं देवं शान्तमुग्रमुदायुधम् । अनेकनयनाकीर्णं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥१५४ ध्यायतो योगिनः सर्वमनोवृत्तिर्विनश्यति । हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं चैतन्यज्योतिरव्‍ययम् ॥१५५ कदम्बगोलकाकारं तुर्यातीतं परात्परम् । अनन्तमानन्दमयं चिन्मयं भास्करं विभुम् ॥१५६ निवातदीपसदृशमकृत्रिममणिप्रभम् । ध्यायतो योगिनस्तस्य मुक्तिः करतले स्थिता ॥१५७ उन नाना आकार वाले, अनेक मुखों वाले, अनेक भुजाओं वाले, अनेक आयुधों वाले, अनेक वर्ण वाले, देवरूप, शान्त, उग्र, आयुधों को उठाये हुये, अनेक नेत्रयुक्त, करोड़ों सूर्यों की प्रभा वाले विश्वरूप विष्णु का ध्यान करने से योगी की सब मनोवृत्तियां नष्ट हो जाती हैं। हृदत-कमल के मध्य स्थान में स्थित चैतन्य, ज्योतिरूप, अव्यय, कदम्ब के समान गोलाकार, तुर्यातीत, परात्पर, अनन्त, Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi